भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 496

४३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादौ । अत्र हि शृङ्गारबीभत्सयोस्तदङ्गयोर्वा वीररसव्यवधानेन समावेशो न विरोधी । विरोधमविरोधं च सर्वत्रेत्थं निरूपयेत् । विशेषतस्तु शृङ्गारे सुकुमारतमो ह्यसौ ॥ २४ ॥ यथोक्तलक्षणानुसारेण विरोधाविरोधौ सर्वेषु रसेषु प्रबन्धेऽन्यत्र च निरूपयेत्सहृदयः; विशेषतस्तु शृङ्गारे । स हि रतिपरिपोषात्मकत्वाद् इत्यादि में। यहाँ शृङ्गार और बीभत्स का अथवा उनके अङ्गों का बीच में वीर रस को रखकर समावेश विरोधी नहीं है। इस प्रकार सभी जगह विरोध और अविरोध का निरूपण करे, किन्तु शृङ्गार में विशेष रूप से; क्योंकि वह सबसे सुकुमार है ॥ २४ ॥ सहृदय (कवि) यथोक्त लक्षण के अनुसार सब रसों में, प्रबन्ध में और अन्यत्र विरोध और अविरोध का निरूपण करे, विशेष रूप से शृङ्गार में; क्योंकि वह रति का लोचनम् मुक्तम् । स्वदेहानित्यनेन देहत्वाभिमानादेव तादात्म्यसम्भावनानिष्पत्तेरेका- श्रयत्वमस्ति, अन्यथा विभिन्नविषयत्वात्को विरोधः । ननु वीर एवात्र रसो न शृङ्गारो न बीभत्स; किन्तु रतिजुगुप्से हि वीरं प्रति व्यभिचारीभूते। भवत्वेवम् , तथापि प्रकृतोदाहरणता तावदुपपन्ना । तदाह—तदङ्गयोर्वेति । तयोरङ्गे तत्स्थायिभावावित्यर्थः। वीररसेति । 'वीराः स्वदेहान्' इत्यादिना तदीयोत्साहाद्य- वगंत्या कर्तृकर्मणोः समस्तवाक्यार्थानुयायितया प्रतीतिरिति मध्यपाठाभावेऽपि सुतरां वीरस्य व्यवधायकतेति भावः ॥ २७ ॥ अन्यत्र चेति मुक्तकादौ । स हि शृङ्गारः सुकुमारतम इति सम्बन्धः । और सम्भावना का आस्पद न होना कहा है। 'अपने शरीरों को' इससे शरीरत्वाभिमान के कारण ही तादात्म्य (अभेद) की सम्भावना निष्पन्न होती है अतः एकाश्रयत्व है, अन्यथा विभिन्न विषय होने के कारण कौन विरोध होता ! (शङ्का) यहां वीर ही रस है, न शृङ्गार है, न बीभत्स है, किन्तु रति और जुगुप्सा वीर के प्रति व्यभिचारी भाव हो गए हैं। (समाधान) इस प्रकार हो भी, तथापि प्रकृत में उदाहरण होना उपपन्न है। उसे कहते हैं—अथवा उनके अङ्गों का—। उनके अङ्ग अर्थात् उनके स्थायी भाव। वीर रस—। भाव यह कि 'वीरों ने अपने शरीरों को' इत्यादि से उनके उत्साह आदि के ज्ञान से कर्ता और कर्म की समस्त वाक्यार्थ में अनुगत रूप से प्रतीति होती है, इसके अनुसार बीच में पाठ न होने पर भी सुतरां वीर ही व्यवधायक है ॥ २७ ॥ और अन्यत्र—। मुक्तक आदि में ! वह शृङ्गार सुकुमारतम है, यह (वाक्य का)