ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः एतदेव स्थिरीकर्तुमिदमुच्यते— रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि । निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता ॥ २७ ॥ रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तत इत्यत्र न काचिद्भ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपिरसयोरुक्तया नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा— भूरेणुदिग्धान्नवपारिजातमालारजोवासितबाहुमध्याः । गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान्सुराङ्गनाश्लिष्टभुजान्तरालाः ॥ सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्भिः पक्षैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवीजिताश्चन्दनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम् । निर्दिश्यमानांल्ललनाङ्गुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन् ॥ इसे ही स्थिर करने के लिए यह कहते हैं— एक ही वाक्य में स्थित रहने वाले होने पर भी दो रसों का दूसरे रस के बीच में होने से समावेश होने पर विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥ दूसरे रस के बीच में होने से एक ही प्रबन्ध में रहने वाले भी ( रसों का ) विरोध निवृत्त हो जाता है, इसमें कोई भ्रम नहीं । क्योंकि उक्त नीति के अनुसार एक वाक्य में रहने वाले ( रसों ) का भी विरोध निवृत्त हो जाता है । जैसे— नये पारिजात की माला के पराग से वासित बाहुमध्य वाले, सुराङ्गनाओं द्वारा आलिङ्गन किए जाते हुए भुजमध्य वाले, सुगन्धि चन्दन के पानी के छिड़काव से युक्त कल्पलता के दुकूलों द्वारा झले जाते गए, विमान के पर्यङ्क पर बैठे वीरों ने ललनाओं की उंगलियों से दिखाए जाते हुए पृथ्वी की धूल में सने, सियारियों द्वारा कसकर पकड़े जाते हुए, खून से भिंगे और चमकते हुए मांसभक्षी पक्षियों के पंखों से झले जाते हुए अपने शरीरों को उस समय कुतूहल से आविष्ट होकर देखा । लोचनम् स्थिरीकर्तुमिति । शिष्यबुद्धावित्यर्थः । अपिशब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धो- ऽयमर्थ इति दर्शयति—भूरेण्विति । विशेषणैरतीव दूरापेतत्वमसम्भावनास्पद- स्थिर करने के लिए—। अर्थात् शिष्य की बुद्धि में । 'भी' शब्द से यह बात सिद्ध हो चुकी है' यह दिखाते हैं— नये पारिजात—। विशेषणों से बहुत दूर की बात होना