ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्द्योतः ४८९ ध्वन्यालोकः यथा च वाच्यविषये प्रमाणान्तरानुगमेन सम्यक्त्वप्रतीतौ क्वचि- त्क्रियमाणायां तस्य प्रमाणान्तरविषयत्वे सत्यपि न शब्दव्यापार- विषयताहानिस्तद्व्यङ्ग्यस्यापि । काव्यविषये च व्यङ्ग्यप्रतीतीनां सत्या- सत्यनिरूपणस्याप्रयोजकत्वमेवेति तत्र प्रमाणान्तरव्यापारपरीक्षोप- हासायैव सम्पद्यते । तस्माल्लिङ्गिप्रतीतिरेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिरिति न शक्यते वक्तुम् । और जैसे वाच्य के विषय में प्रमाणान्तर के अनुगमन से कहीं पर सम्यक्त्व की प्रतीति करने पर उसके प्रमाणान्तर का विषय होने पर भी शब्दव्यापार विषयत्व की हानि नहीं होती उसी प्रकार व्यङ्ग्य की भी । और काव्य के विषय में व्यङ्ग्य की प्रतीतियों का सत्यासत्यनिरूपण अप्रयोजक ही है, इसलिए वहाँ प्रमाणान्तर के व्यापार की परीक्षा उपहासास्पद ही होगी । इसलिए लिङ्गी की प्रतीति ही सर्वत्र व्यङ्ग्य की प्रतीति है यह नहीं कह सकते । लोचनम् न चैतावता वाच्यस्य प्रतीतिरानुमानिकी किं तु तद्गतस्य ततोऽधिकस्य सत्यत्वस्य तद्व्यङ्ग्येऽपि भविष्यति । एतदाह—यथा चेत्यादिना । एतच्चाभ्युप गम्योक्तं न त्वनेन नः प्रयोजनमित्याहुः । काव्यविषये चेति । अप्रयोजकत्वमिति । न हि तेषां वाक्यानामग्निष्टोमादिवाक्यवत्सत्यार्थप्रतिपादनद्वारेण प्रवर्त्तकत्वाय प्रामाण्यमन्विष्यते, प्रीतिमात्रपर्यवसायित्वात् । प्रीतेरेव चालौकिकचमत्कार- रूपाया व्युत्पत्त्यङ्गत्वात् । एतच्चोक्तं वितत्य प्राक् । उपहासायैवेति । नायं सहृदयः केवलं शुष्कतर्कोपक्रमकर्कशहृदयः प्रतीतिं पराम्रष्टुं नालमित्येष उपहासः । इतने मात्र से वाच्य की प्रतीति अनुमान-प्राप्त नहीं समझी जा सकती, उसे व्यङ्ग्य मानने पर भी उसके अधिक सत्यत्व की (प्रतीति) हो सकती है । इसे कहते हैं—और जैसे—। इत्यादि द्वारा । इसे अभ्युपगम करके कहा है इससे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है यह कहते हैं । और काव्य के विषय में—। अप्रयोजक—। अग्निष्टोमादि वाक्यों (‘अग्निष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’) की भाँति सत्य अर्थ के प्रतिपादन के द्वारा प्रवृत्त कराने के लिए उन वाक्यों का प्रामाण्य नहीं ढूँढ़ते, क्योंकि (ये) प्रीति मात्र तक पर्यवसित हो जाते हैं । क्योंकि अलौकिक चमत्कार रूप प्रीति ही व्युत्पत्ति का अङ्ग है । इसे विस्तारपूर्वक कह चुके हैं । उपहासास्पद ही—। यह सहृदय नहीं है, केवल शुष्क तर्क के उपक्रम से कर्कश हृदय वाला व्यक्ति है क्योंकि प्रतीति का परामर्श नहीं कर सकता, यह उपहास है ।