भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 680 में से

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पृष्ठ 550

४९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यच्चनुमेयरूपव्यङ्ग्यविषयं शब्दानां व्यञ्जकत्वं तद्ध्वनिव्यवहार- स्याप्रयोजकम् । अपि तु व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दानां व्यापार औत्प- त्तिकशब्दार्थसम्बन्धवादिनाप्यभ्युपगन्तव्य इति प्रदर्शनार्थमुपन्यस्त- म् । तद्धि व्यञ्जकत्वं कदाचिल्लिङ्गत्वेन कदाचिद्रूपान्तरेण शब्दानां वाचकानामवाचकानां च सर्ववादिभिरप्रतिषेध्यमित्ययमस्माभिर्यत्न जो कि अनुमेय रूप व्यङ्ग्य के विषय वाला शब्दों का व्यञ्जकत्व है, वह ध्वनि व्यवहार का प्रयोजक नहीं। अपितु शब्दों के व्यञ्जकत्वरूप व्यापार को शब्दार्थ सम्बन्ध को औत्पत्तिक मानने वाले को भी स्वीकार करना चाहिए, यह दिखाने के लिए उपन्यस्त किया है। वाचक और अवाचक शब्दों के उस व्यञ्जकत्व को कभी अनुमान के द्वारा कभी रूपान्तर से सभी वादियों को मानना ही होगा, इसलिए यह यत्न हमने किया है। तो इस प्रकार गुणवृत्ति, वाचकत्व आदि शब्द के प्रकारों लोचनम् नन्वेवं तर्हि मा भूद्यत्र यत्र व्यञ्जकता तत्र तत्रानुमानत्वम्; यत्र यत्रानु- मानत्वं तत्र तत्र व्यञ्जकत्वमिति कथमपह्नुयत इत्याशङ्कयाह—यच्चनुमेयेति । तद्व्यञ्जकत्वं न ध्वनिलक्षणमभिप्रायव्यतिरिक्तविषयाव्यापारादिति भावः । नन्वभिप्रायविषयं यद्व्यञ्जकत्वमनुमानैकयोगक्षेमं तच्चेन्न प्रयोजकं ध्वनिव्यव- हारस्य तर्हि किमर्थं तत्पूर्वमुपक्षिपतमित्याशङ्कयाह—अपि त्विति । एतदेव संक्षिप्य निरूपयति—तद्धीति । अत एव हि क्वचिदनुमानेनाभिप्राय़ादौ क्वचित्प्रत्यक्षेण दीपालोकादौ क्वचित्कारणत्वेन गीतध्वन्यादौ क्वचिदभिधया विवक्षितान्यपरे क्वचिद्गुणवृत्त्या अविवक्षितवाच्येऽनुगृह्यमाणं व्यञ्जकत्वं दृष्टं इस प्रकार जहाँ-जहाँ व्यंजकता है वहाँ-वहाँ अनुमानता मत हो, किन्तु जहाँ-जहाँ अनुमानता है वहाँ-वहाँ व्यंजकत्व है इसे कैसे छिपाया जा सकता है, यह आशङ्का करके कहते हैं—जो कि अनुमेय—। भाव यह कि वह व्यंजकत्व ध्वनिरूप नहीं है, क्योंकि अभिप्राय से व्यतिरिक्त विषय ( रस अलङ्कार आदि व्यङ्ग्य ) में व्यापार-रहित है। एकमात्र अनुमान के साथ योगक्षेम वाला जो अभिप्राय के विषय का व्यंजकत्व है वह यदि ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक नहीं है तो उसे पहले कैसे उपन्यस्त किया है ? यह आशंका करके कहते हैं—अपि तु—। इसे ही संक्षेप में निरूपण करते हैं—उस व्यंजकत्व को—। जिस कारण कहीं अनुमान से, जैसे अभिप्राय आदि में, कहीं प्रत्यक्ष से जैसे दीप के आलोक आदि में, कहीं कारण रूप से जैसे गीत ध्वनि आदि में, कहीं अभिधा से विवक्षितान्यपर से, कहीं गुणवृत्ति जैसे अविवक्षितवाच्य में अनुगृह्यमाण