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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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तृतीय उद्योतः ४९१


ध्वन्यालोकः

आरब्धः। तदेवं गुणवृत्तिवाचकत्वादिभ्यः शब्दप्रकारेभ्यो नियमेनैव तावद्विलक्षणं व्यञ्जकत्वम्। तदन्तःपातित्वेऽपि तस्य हठादभिधीय- माने तद्विशेषस्य ध्वनेर्यत्प्रकाशनं विप्रतिपत्तिनिरासाय सहृदयव्युत्पत्तये वा तत्क्रियमाणमनतिसन्धेयमेव। न हि सामान्यमात्रलक्षणेनोपयोगि- विशेषलक्षणानां प्रतिक्षेपः शक्यः कर्तुम्। एवं हि सति सत्तामात्रल- क्षणे कृते सकलसद्वस्तुलक्षणानां पौनरुक्त्यप्रसङ्गः। तदेवम्— से व्यञ्जकत्व नियमतः ही विलक्षण है। जबर्दस्ती अभिधा में उसे (व्यञ्जकत्व) अन्त- र्भुक्त करने पर भी उसके विशेष रूप ध्वनि का जो प्रकाशन विप्रतिपत्तियों के निरा- करण के लिए अथवा सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिए किया जा रहा है उसे अतिसं- धान नहीं किया जा सकता। सामान्य मात्र के लक्षण कर देने पर उपयोगी विशेष के लक्षणों का निराकरण नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसा होने पर 'सत्ता' मात्र के लक्षण कर दिये जाने पर समस्त सद्वस्तुओं का पौनरुक्त प्रसक्त होगा। तो इस प्रकार—

लोचनम्

तत एव तेभ्यः सर्वेभ्यो विलक्षणमस्य रूपं नत्सिध्यति तदाह—तदेवमिति। ननु प्रसिद्धस्य किमर्थं रूपसंकोचः क्रियते अभिधाव्यापारगुणवृत्त्यादेः। तस्यैव सामग्र्यन्तरोपनिपाताद्यद्विशिष्टं रूपं तदेव व्यञ्जकत्वमुच्यतामित्याश- ङ्कयाह—तदन्तःपातित्वेऽपीति। न वयं संज्ञानिवेशनादि निषेधाम इति भावः। विप्रतिपत्तिस्तादृग्वि शेषो नास्तीति। व्युत्पत्तिः संशयाज्ञाननिरासः। न हीति। उपयोगिषु विशेषेषु यानि लक्षणानि तेषाम्। उपयोगिपदेनानुपयोगिनां काकद- न्तादीनां व्युदासः। एवं हीति। त्रिपदार्थसङ्करी सत्तेत्यनेनैव द्रव्यगुणकर्मणां लक्षितत्वाच्छ्रुतिस्मृत्यायुर्वेदधनुर्वेदप्रभृतीनां सकललोकयात्रोपयोगिनामनारम्भः व्यंजकत्व देखा गया है इसी कारण इन सभी से इसका विलक्षण रूप हमें सिद्ध होता है, उसे कहते हैं—तो इस प्रकार—। प्रसिद्ध अभिधा व्यापार, गुणवृत्ति आदि का रूपसंकोच किसलिए करते हैं, उसी ( अभिधा व्यापार आदि ) का अन्य सामग्री के प्राप्त होने से जो विशिष्ट रूप है वही व्यंजकत्व कहा जाय, यह आशङ्का करके कहते हैं—अन्तर्भुक्त करने पर भी—। भाव यह कि हम नाम के प्रवेश आदि का निषेध नहीं करते । विप्रतिपत्ति अर्थात् इस प्रकार का विशेष ( व्यंजकत्व ) नहीं है ( यह विरुद्ध ज्ञान ) व्युत्पत्ति अर्थात् संशय और अज्ञान का निराकरण । सामान्य मात्र—। उपयोगी विशेषों में जो लक्षण हैं उनका । 'उपयोगी' पद से अनुपयोगी काकदन्त आदि का निराकरण है। क्योंकि ऐसा होने पर—। भाव यह कि 'सत्ता तीन पदार्थों में रहती है। इसी ( लक्षण ) से ही द्रव्य, गुण, कर्म लक्षित हो जाने पर सकल लोकयात्रा के उपयोगी श्रुति, स्मृति, आयुर्वेद,