ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 552, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें४९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विमतिविषयो य आसीन्मनीषिणां सततमविदितसतत्त्वः । ध्वनिसञ्ज्ञितः प्रकारः काव्यस्य व्यञ्जितः सोऽयम् ॥ प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः काव्यस्य दृश्यते । यत्र व्यङ्ग्यान्वये वाच्यचारुत्वं स्यात्प्रकर्षवत् ॥ ३४॥ व्यङ्ग्योऽर्थो ललनालावण्यप्रख्यो यः प्रतिपादितस्तस्य प्राधान्ये ध्वनिरित्युक्तम् । तस्य तु गुणीभावेन वाच्यचारुत्वप्रकर्षे गुणीभूत- हमेशा से अविदितस्वरूप होने के कारण जो मनीषी लोगों की विमति का विषय था, काव्य के ध्वनि नाम के उस इस प्रकार को व्यञ्जित किया गया । जहाँ व्यङ्ग्य का सम्बन्ध होने पर वाच्य का चारुत्व प्रकृष्ट होता है, काव्य का (वहाँ) अन्य प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य देखा जाता है ॥ ३४ ॥ ललना के लावण्य के समान जो व्यङ्ग्य अर्थ प्रतिपादन किया गया है उसके प्राधान्य में ध्वनि है यह कह चुके हैं । किन्तु उसके गुणीभाव से वाच्य के चारुत्व लोचनम् स्यादिति भावः । विमतिविषयत्वे हेतुः-अविदितसतत्त्व इति । अत एवाधुनात्र न कस्यचिद्विमतिरेतस्मात्क्षणात्प्रभृतीति प्रतिपादयितुम्-आसीत् इत्युक्तम् ॥३३॥ एवं यावद्ध्वनेरात्मीयं रूपं भेदोपभेदसहितं यच्च व्यञ्जकभेदमुखेन रूपं तत्सर्वं प्रतिपाद्य प्राणभूतं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावमेकप्रघट्टकेन शिष्यबुद्धौ विनिवे- शयितुं व्यञ्जकवादस्थानं रचितमिति ध्वनिं प्रति यद्वक्तव्यं तदुक्तमेव । अधुना तु गुणीभूतोऽप्ययं व्यङ्ग्यः कविवाचः पवित्रयतीत्यमुना द्वारेण तस्यैवात्मत्वं समर्थयितुमाह-प्रकार इति । व्यङ्ग्येनान्वयो वाच्यस्योपस्कार इत्यर्थः । प्रतिपादित इति । 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इत्यत्र । उक्तमिति । 'यत्रार्थः शब्दो धनुर्वेद प्रभृत्ति शास्त्र बन्द हो जायँगे । विमति का विषय होने में कारण है-अविदित- स्वरूप-। अतएव अब इस क्षण से इसमें किसी की विमति नहीं है इसे प्रतिपादन करने के लिए 'था' यह कहा है ॥ ३३ ॥ इस प्रकार जितना ध्वनि का भेदोपभेदसहित स्वरूप है और जो व्यंजक के भेद के प्रकार से रूप है उन सबको प्रतिपादन करके प्राणभूत व्यङ्ग्यव्यंजक भाव को एक प्रघट्टक द्वारा शिष्य की बुद्धि में बैठाने के लिए व्यंजकवाद का स्थान बनाया है । इस प्रकार ध्वनि के प्रति जो कहना चाहिए वह कह ही चुके । अब गुणीभूत भी यह व्यङ्ग्य कवियों की वाणी को पवित्र करता है, इसलिए इस द्वारा उसी (व्यङ्ग्य) का स्वरूप समर्थनार्थ कहते हैं-जहाँ व्यङ्ग्य- । व्यङ्ग्य का सम्बन्ध और वाच्य का उपस्कार । प्रतिपादन किया गया है-। 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इस स्थल में । कह चुके