भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 680 में से

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पृष्ठ 553

तृतीय उद्योतः ४९३ ध्वन्यालोकः व्यङ्ग्यो नाम काव्यप्रभेदः प्रकल्प्यते । तत्र वस्तुमात्रस्य व्यङ्ग्यस्य तिरस्कृतवाच्येभ्यः प्रतीयमानस्य कदाचिद्वाच्यरूपवाक्यार्थापेक्षया गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यता । यथा— लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते । उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलिकाण्डमृणालदण्डाः ॥ का प्रकर्ष होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्य नाम का काव्य का प्रभेद कल्पित किया जाता है। वहाँ तिरस्कृत वाच्य वाले (शब्दों) से प्रतीयमान व्यङ्ग्य का कभी वाच्य रूप वाक्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्यता होती है। जैसे— यहाँ यह कौन विलक्षण ही लावण्य की नदी है जिसमें चन्द्रमा के साथ कमल तैर रहे हैं, जिसमें हाथी के कुम्भ का अग्रभाग निकल रहा है और जिसमें विलक्षण ही कदलीकाण्ड और मृणाल दण्ड हैं। लोचनम् वा' इत्यत्रान्तरे व्यङ्ग्यं च वस्त्वावित्रयं तत्र वस्तुनो व्यङ्ग्यस्य ये भेदा उक्तास्तेषां क्रमेण गुणभावं दर्शयति—तत्रेति । लावण्येति । अभिलापविस्मय- गर्भेयं कस्यचित्तरुणस्योक्तिः । अत्र सिन्धुशब्देन परिपूर्णता, उत्पलशब्देन कटाक्षच्छटाः, शशिशब्देन वदनं, द्विरदकुम्भतटीशब्देन स्तनयुगलं, कदलिकाण्डशब्देनोरुयुगलं, मृणालद- ण्डशब्देन दोर्युग्ममिति ध्वन्यते । तत्र चैषां स्वार्थस्य सर्वथानुपपत्तेरन्धशब्दो- क्तेन न्यायेन तिरस्कृतवाच्यत्वम् । स च प्रतीयमानोऽप्यर्थविशेषः 'अपरैव हि केयं' इत्युक्तिगर्भकृते वाच्येऽशे चारुत्वच्छायां विधत्ते, वाच्यस्यैव स्वात्मोन्म- हैं—। 'यत्रार्थः शब्दो वा' इसके प्रसङ्ग में वस्तु आदि तीन व्यङ्ग्य कहे गये हैं। उनमें वस्तु व्यङ्ग्य के जो भेद कहे गये हैं उनका क्रम से गुणभाव दिखाते हैं— वहाँ—।—लावण्य—। यह किसी तरुण की अभिलाष और विस्मय से युक्त उक्ति है। यहाँ 'नदी' शब्द से परिपूर्णता, 'कमल' शब्द से कटाक्ष की छटा, 'शशी' शब्द से मुख, 'हाथ के कुम्भ का अग्रभाग' शब्द से स्तनयुगल 'कदलीकाण्ड' शब्द से ऊरुयुगल, 'मृणालदण्ड' शब्द से हस्तयुगल ध्वनित होते हैं और वहाँ इनके स्वार्थ के सर्वथा अनुपपन्न होने के कारण 'अन्ध' शब्द में कहे गये न्याय के अनुसार तिरस्कृत वाच्यत्व है। और वह प्रतीयमान (व्यङ्ग्य) भी अर्थविशेष 'यह कौन विलक्षण ही' इस उक्ति से युक्त वाच्य अंश में चारुत्वच्छाया का विधान करता है,