भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 680 में से

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पृष्ठ 554

४९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अतिरस्कृतवाच्येभ्योऽपि शब्देभ्यः प्रतीयमानस्य व्यङ्ग्यस्य कदाचिद्वाच्यप्राधान्येन काव्यचारुत्वापेक्षया गुणीभावे सति गुणी- भूतव्यङ्ग्यता, यथोदाहृतम्-‘अनुरागवती सन्ध्या' इत्येवमादि । अतिरस्कृतवाच्य भी शब्दों से प्रतीयमान व्यङ्ग्य की कभी वाच्य के प्राधान्य से काव्य चारुत्व की अपेक्षा गुणीभाव होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्यता होती है, जैसे उदाहरण दे चुके हैं 'अनुरागवती सन्ध्या' इस प्रकार आदि । उसी (व्यङ्ग्य) का लोचनम् जनया निमज्जितव्यङ्ग्यजातस्य सुन्दरत्वेनावभासनात् । सुन्दरत्वं चास्यास- म्भाव्यमानसङ्गमसकललोकसारभूतकुवलयादिभाववर्गस्यातिसुभगैकाधिकर- णविश्रान्तिलब्धसमुच्चयरूपतया विस्मयविभावताप्राप्तिपुरस्कारेण व्यङ्ग्यार्थोप- स्कृतस्य तथा विचित्रस्यैव वाच्यरूपोन्मज्जनेनाभिलाषादिविभावत्वात् । अत एवेयति यद्यपि वाच्यस्य प्राधान्यं, तथापि रसध्वनौ तस्यापि गुणतेति सर्वस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य प्रकारे मन्तव्यम् । अत एव ध्वनेरेवात्मत्वमित्युक्तचरं बहुशः । अन्ये तु जलक्रीडावतीर्णतरुणीजनलावण्यद्रवसुन्दरीकृतनदीविषयेयमुक्ति- रिति सहृदयाः, तत्रापि चोक्तप्रकारेणैव योजना । यदि वा नदीसन्निधौ स्नाना- वतीर्णयुवतिविषया । सर्वथा तावद्विस्मयमुखेनेयति व्यापाराद्गुणताव्यङ्ग्यस्य । उदाहृतमिति । एतच्च प्रथमोद्द्योत एव निरूपितम् । अनुरागशब्दस्य चाभिलाषे तदुपपरक्तत्वलक्षणया लावण्यशब्दवत्प्रवृत्तिरित्त्यभिप्रायेणातिरस्कृतवाच्यत्वमु- क्योंकि वाच्य के ही स्वरूप के उन्मज्जित होने और व्यङ्ग्यसमूह के निमज्जित होने से सुन्दर रूप से प्रतीति होती है । सुन्दरत्व इस लिए है कि जिनका समागम सम्भा- व्यमान नहीं है ऐसे सकललोक के सारभूत कुवलयादि भाव वर्ग की अतिसुभग (नायिका रूप) एक अधिकरण में विश्रान्ति से समुच्चयरूप प्राप्त होने से विस्मय के विभावत्व की प्राप्तिपूर्वक व्यङ्ग्य अर्थ से उपस्कृत तथा विचित्र ही (वाच्य) वाच्य रूप के उन्मज्जन के कारण अभिलाष आदि का विभाव बन जाता है । इसी लिए इतने में यद्यपि वाच्य का प्राधान्य है तथापि रसध्वनि में उसका भी गुणभाव हो जाता है, इस प्रकार सभी गुणीभूत व्यङ्ग्य के प्रकार में मानना चाहिए । इसीलिए बहुत बार कह चुके हैं कि ध्वनि ही काव्य का आत्मा है । किन्तु अन्य सहृदय लोगों के अनुसार यह जलक्रीड़ा के लिए अवतीर्ण युवतियों के लावण्यद्रव से सुन्दरीकृत नदी के सम्बन्ध में उक्ति है और वहाँ पर भी उक्त प्रकार से ही योजना होगी । अथवा यह नदी में स्नानार्थ अवतीर्ण युवतियों के सम्बन्ध में (उक्ति) है । सब प्रकार से विस्मय के प्रकार से इतने में व्यापार होने से व्यङ्ग्य का गुणीभाव है । उदाहरण दे चुके हैं—। इसे प्रथम उद्योत में ही निरूपण कर चुके हैं। 'अनुराग' शब्द की 'अभिलाष' अर्थ में उसमें उपरक्तत्व में लक्षणा द्वारा 'लावण्य'