ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४९५ ध्वन्यालोकः तस्यैव स्वयमुक्त्या प्रकाशीकृतत्वेन गुणीभावः, यथोदाहृतम्— ‘सङ्केतकालमनसम्’ इत्यादि । रसादिरूपव्यङ्ग्यस्य गुणीभावो रसवद- लङ्कारे दर्शितः ; तत्र च तेषामाधिकारिकवाक्यापेक्षया गुणीभावो विवहनप्रवृत्तभृत्यानुयायिराजवत् । व्यङ्ग्यालङ्कारस्य गुणीभावे दीपकादिविषयः । तथा— स्वयं उक्ति से प्रकाशित होने पर गुणीभाव होता है, जैसे उदाहरण दे चुके हैं ‘सङ्केतकालमनसं०’ इत्यादि । रसादि रूप व्यङ्ग्य का गुणीभाव रसवद् अलङ्कार में दिखाया जा चुका है, वहाँ उनका आधिकारिक वाक्य की अपेक्षा गुणीभाव विवाह में प्रवृत्त भृत्य का अनुगमन करने वाले राजा की भांति होता है । व्यङ्ग्य अलङ्कार के गुणीभाव में दीपक आदि विषय हैं । उस प्रकार— लोचनम् क्तम् । तस्यैवेति । वस्तुमात्रस्य । रसादीति । आदिशब्देन भावादयः रसवच्छ- ब्देन प्रेयस्विप्रभृतयोऽलङ्कारा उपलक्षिताः । नन्वत्यर्थं प्रधानभूतस्य रसादेः कथं गुणीभावः, गुणीभावे वा कथमचा- रुत्वं न स्यादित्याशङ्क्य प्रत्युत सुन्दरता भवतीति प्रसिद्धदृष्टान्तमुखेन दर्श- यति—तत्र चेति । रसवदाद्यलङ्कारविषये । एवं वस्तुनो रसादेश्च गुणीभावं प्रदर्श्यालङ्कारात्मनोऽपि तृतीयस्य व्यङ्ग्यप्रकारस्य तं दर्शयति—व्यङ्ग्यालङ्का- रस्येति । उपमादेः ॥ ३४ ॥ एवं प्रकारत्रयस्यापि गुणभावं प्रदर्श्य बहुतरलक्ष्यव्यापकतास्येति दर्शयि- तुमाह—तथेति । प्रसन्नानि प्रसादगुणयोगाद्गम्भीराणि च व्यङ्ग्यार्थात्क्षेपक्तवा- शब्द की भाँति प्रवृत्ति है, इसलिए अतिरस्कृत वाच्यत्व कहा है उसी का—। वस्तु- मात्र का । रसादि—। ‘आदि’ शब्द से भाव आदि, ‘रसवत्’ शब्द से प्रेयस्वी प्रभृति अलङ्कार उपलक्षित होते हैं । अत्यन्त प्रधानभूत रस आदि का गुणीभाव कैसे होगा ? या गुणीभाव होने पर अचारुत्व कैसे नहीं होगा ? यह आशङ्का करके ‘बल्कि सुन्दरता होती है’ इस बात को प्रसिद्ध दृष्टान्त के द्वारा दिखाते हैं—वहाँ—। रसवत् आदि अलङ्कारों के विषय में । इस प्रकार वस्तु रूप और रसादि का गुणीभाव प्रदर्शित करके अलङ्कार रूप उस तीसरे व्यङ्ग्य प्रकार को दिखाते हैं—व्यङ्ग्य अलङ्कार के—। उपमा आदि के—॥ ३४ ॥ इस प्रकार तीनों प्रकारों का भी गुणभाव दिखाकर इसकी बहुत लक्ष्यों में व्यापकता है यह दिखाने के लिए कहते हैं—उस प्रकार—। प्रसादगुण के योग से प्रसन्न और