भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 680 में से

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पृष्ठ 556

४९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रसन्नगम्भीरपदाः काव्यबन्धाः सुखावहाः । ये च तेषु प्रकारोऽयमेव योज्यः सुमेधसा ॥ ३५ ॥ ये चैतेऽपरिमितस्वरूपा अपि प्रकाशमानास्तथाविधार्थरमणीयाः सन्तो विवेकिनां सुखावहाः काव्यबन्धास्तेषु सर्वेष्वेवायं प्रकारो गुणी- भूतव्यङ्ग्यो नाम योजनीयः । यथा— प्रसन्न और गम्भीर पद वाले जो सुखावह काव्यबन्ध होते हैं उनमें सुमेधा को यही प्रकार जोड़ना चाहिए ॥ ३५ ॥ और जो ये अपरिमितस्वरूप भी प्रकाशमान उस प्रकार के अर्थ रमणीय होते हुए विवेकी जनों के सुखावह काव्य बन्ध हैं उन सभी में यह गुणीभूत व्यङ्ग्य नाम का प्रकार जोड़ना चाहिए। जैसे— लोचनम् त्पदानि येषु । सुखावहा इति चारुत्वहेतुः । तत्रायमेव प्रकार इति भावः । सुमेधसेति । यस्त्वेतं प्रकारं तंत्र योजयितुं न शक्तः स परमलीकसहृदयभावना- मुकुलितलोचनोक्त्योपहसनीयः स्यादिति भावः । लक्ष्मीः सकलजनाभिलाषभूमिर्दुहिता । जामाता हरिः यः समस्तभोगाप- वर्गदानसततोद्यमी । तथा गृहिणी गङ्गा यस्याः समभिलषणीये सर्वस्मिन्वस्तु- न्यपहत उपायभावः । अमृतमृगाङ्कौ च सुतौ, अमृतमिह वारुणी । तेन गङ्गा- स्नानहरिचरणाराधनाद्युपायशतलब्धाया लक्ष्म्याश्चन्द्रोदयपानगोष्ठ्युपभोगल- क्षणं मुख्यं फलमिति त्रैलोक्यसारभूतता प्रतीयमाना सती अहो कुटुम्बं महोदधेरित्यहोशब्दाच्च गुणीभावमनुभवत ॥ ३५ ॥ व्यङ्ग्य अर्थ के आक्षेपक होने से गम्भीर पद हैं जिनमें । सुखावह अर्थात् चारुत्व के हेतु। भाव वह कि यहाँ भी यही प्रकार—है। सुमेधा को—। भाव यह कि जो इस प्रकार को वहाँ जोड़ने में समर्थ नहीं है वह 'अलीक सहृदय भावना से मुकुलित लोचनों वाला है' इस कथन से उपहास के योग्य है। समस्त लोगों के अभिलाष की भूमि लक्ष्मी पुत्री है। जामाता विष्णु जी समस्त भोग और अपवर्ग (मोक्ष) को देने के लिए सतत उद्यमशील रहते हैं। पत्नी गङ्गा जिसका उपायभाव समभिलषणीय समस्त वस्तु में अपहृत है और अमृत तथा चन्द्रमा पुत्र हैं। 'अमृत' यहाँ वारुणी (मदिरा) है। इस (अर्थ) से गङ्गास्नान, हरिचरण के आराधन आदि सैकड़ों उपायों से लक्ष्मी का मुख्य फल चन्द्रोदय और पानगोष्ठी का उपभोग है; इस प्रकार (समुद्र की) त्रैलोक्य में सारभूतता प्रतीयमान (व्यङ्ग्य) होती हुई 'वाह रे, महासमुद्र का परिवार !' यहाँ 'वाह रे' शब्द से गुणीभाव को प्राप्त करती है ॥ ३५ ॥

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