भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 680 में से

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पृष्ठ 557

तृतीय उद्योतः ४९७ ध्वन्यालोकः लच्छी दुहिदा जामाउओ हरी तंस धरिणिआ गङ्गा । अमिअमिअङ्का अ सुआ अहो कुडुम्बं महोअहिणो ॥ वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यांशानुगमे सति । प्रायेणैव परां छायां बिभ्रल्लक्ष्ये निरीक्ष्यते ॥ ३६ ॥ वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यांशस्यालङ्कारस्य वस्तुमात्रस्य वा यथायोगमनुगमे सति च्छायातिशयं बिभ्रल्लक्षणकारैरेकदेशेन दर्शितः । स तु तथारूपः प्रायेण सर्व एव परीक्ष्यमाणो लक्ष्ये निरीक्ष्यते । उसकी पुत्री लक्ष्मी जामाता विष्णु, पत्नी गङ्गा और अमृत और चन्द्रमा पुत्र हैं वाह रे ! यह समुद्र का परिवार है ? यह वाच्य अलङ्कारवर्ग व्यङ्ग्य—अंश का अनुगम होने पर प्रायः करके अतिशय शोभा धारण करता हुआ लक्ष्य में देखा जाता है ॥ ३६ ॥ यह वाच्य अलङ्कारवर्ग व्यङ्ग्यांश अलङ्कार अथवा वस्तुमात्र का यथायोग्य अनुगम होने पर अतिशय शोभा को धारण करता हुआ लक्षणकारों द्वारा एक देश से (स्थाली- पुलाक न्याय से) दिखाया गया है । उस प्रकार का वह परीक्षा करने पर प्रायः लोचनम् एवं निरलङ्कारेपूत्तानतायां तुच्छतयैव भासमानममुनान्तःसारेण काव्यं पवित्रीकृतमित्युक्त्वालङ्कारस्याप्यनेनैव रम्यतरत्वमिति दर्शयति—वाच्येति । अंशत्वं गुणमात्रत्वम् । एकदेशेनेति । एकदेशविवर्तिरूपकमनेन दर्शितम् । तदयमर्थः—एकदेशविवर्तिरूपके— राजहंसैर्वीज्यन्त शरदैव सरोनृपाः इत्यत्र हंसानां यच्चामरत्वं प्रतीयमानं तन्नृपा इति वाच्येऽर्थे गुणतां प्राप्त- मलङ्कारकारैर्यावदेव दर्शितं तावदमुना द्वारेण सूचितोऽयं प्रकार इत्यर्थः । अन्ये त्वेकदेशेन वाच्यभागवैचित्र्यमात्रेणेत्यनुद्भिग्नमेव व्याचचक्षिरे । व्यङ्ग्यं यद्- इस प्रकार निरलङ्कार (काव्यों) में आपातः प्रतीति में तुच्छरूप से भासमान काव्य इस अन्तःसार (गुणीभूत व्यङ्ग्य) द्वारा पवित्र कर दिया गया है यह कह कर अलङ्कार का भी इसी से रम्यतरत्व होता है यह दिखाते हैं—यह वाच्य—। अंश अर्थात् गुणमात्र । एकदेश से—। इससे एकदेशविवर्ति रूपक को दिखाया है । तो यह अर्थ है—एकदेशविवर्तिरूपक में— ‘शरद ने ही सरोवररूपी राजाओं के राजहंसों से झले।’ अर्थात् यहाँ जो हंसों का चामरत्व व्यङ्ग्य हो रहा है वह ‘राजा’ इस वाच्य अर्थ में गुणता को प्राप्त है, इस प्रकार आलङ्कारिकों ने जितना ही दिखाया है उस प्रकार को इस ढंग से सूचित किया है । किन्तु अन्य लोगों ने ‘एकदेश से अर्थात् वाच्यभाग ३२ ध्व०

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