ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तथा हि—दीपकसमासोक्त्यादिवदन्येऽप्यलङ्काराः प्रायेण व्यङ्ग्यचालङ्का- रान्तरवस्त्वन्तरसंस्पर्शिनो दृश्यन्ते । यतः प्रथमं तावदतिशयोक्ति- गर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया । कृतैव च सा महाकविभिः कामपि काव्यच्छविं पुष्यति, कथं ह्यतिशययोगिता स्वविषयौचित्येन क्रियमाणा सभी लक्ष्य में देखा जाता है। जैसा कि—दीपक, समासोक्ति आदि की भाँति अन्य भी अलङ्कार प्रायः करके व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर और वस्त्वन्तर का स्पर्श करने वाले देखे जाते हैं। क्योंकि पहले तो सब अलङ्कारों में अतिशयोक्ति—गर्भता हो सकती है । महाकवियों द्वारा की जाने पर ही वह कुछ अपूर्व काव्य की शोभा बढ़ाती है । क्योंकि लोचनम् लङ्कारान्तरं वस्त्वन्तरं च संस्पृशन्ति ये स्वात्मनः संस्कारायाश्लिष्यन्तीति ते तथा । महाकविभिरिति । कालिदासादिभिः । काव्यशोभां पुष्यतीति यदुक्तं तत्र हेतुमाह—कथं हीति । हिशब्दो हेतौ । अतिशययोगिता कथं नोत्कर्षमावहेत् काव्ये नास्त्येवासौ प्रकार इत्यर्थः । स्वविषये यदौचित्यं तेन चेद्धृदयस्थितेन तामतिशयोक्तिं कविः करोति । यथा भट्टेन्दुराजस्य— यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् । दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥ अत्र हि भगवतो मन्मथवपुषः सौभाग्यविषयः सम्भाव्यत एवायमतिशय के वैचित्र्यमात्र से' यह अस्पष्टार्थक व्याख्यान किया है। जो व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर और वस्त्वन्तर का स्पर्श करते हैं, अपने संस्कार के लिए आश्लेष करते हैं वे उस प्रकार । महाकवियों द्वारा—। कालिदास आदि द्वारा । 'काव्य की शोभा को बढ़ाती है' यह जो कहा है उसमें हेतु कहते हैं—अतिशययोगिता—। ( 'हि' शब्द हेतु' अर्थ में है । ) अतिशययोगिता कैसे नहीं उत्कर्ष लायेगी अर्थात् काव्य में वह प्रकार नहीं ही है । अपने विषय में जो औचित्य है उस हृदयस्थित ( औचित्य से ) उस अतिशयोक्ति को कवि करता है । जैसे भट्ट इन्दुराज का— दृष्टिपातों के प्रसंग में बहुत वार आँखें विश्राम करके जो स्थैर्य रहित हो जाती हैं, अङ्ग प्रतिदिन कहे हुए कमलिनी के नाल की भाँति जो सूखते जा रहे हैं, गालों में दूर्वाकाण्ड का अनुकरण करने वाला घना जो कि पीलापन है, युवक कृष्ण के प्रति तरुणी गोपियों में ऐसी ही वेषरचना हो गई है । यहाँ मन्मथ की भाँति शरीर वाले भगवान् का सौभाग्यविषयक अतिशय सम्भा-