ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४९९ ध्वन्यालोकः सती काव्ये नोत्कर्षमावहेत् । भामहेनाप्यतिशयोक्तिलक्षणे यदुक्तम्— सैषा सर्वैव वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ इति । अतिशय योगिता अपने विषय के औचित्य से की जाने पर कैसे नहीं काव्य में उत्कर्ष लायेगी ? भामहने भी अतिशयोक्ति के लक्षण में जो यह कहा है— यह सभी ही ( अतिशयोक्ति ) वक्रोक्ति है, इससे अर्थ शोभित हो जाता है । इसमें कवि को यत्न करना चाहिए । इसके बिना कौन अलङ्कार है ! लोचनम् इति तत्काव्ये लोकोत्तरैव शोभोल्लसति । अनौचित्येन तु शोभा लीयेत एव । यथा— अल्पं निर्मितमाकाशमनालोच्यैव वेधसा । इदमेवंविधं भावि भवत्याः स्तनजृम्भणम् ॥ इति । नन्वतिशयोक्तिः सर्वालङ्कारेषु व्यङ्ग्यतयान्तर्लीनैवास्त इति यदुक्तं तत्क- थम् ? यतो भामहोऽतिशयोक्तिं सर्वालङ्कारसामान्यरूपामवादीत् । न च सामान्यं शब्दाद्विशेषप्रतीतेः पृथग्भूततया पश्चात्तनत्वेन चकास्तीति कथमस्य व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कयाह—भामहेनेति । भामहेनापि यदुक्तं तत्रायमेवार्थोऽवग- न्तव्य इति दूरेण सम्बन्धः । किं तदुक्तम्—सैषेति । यातिशयोक्तिर्लक्षिता सैव सर्वा वक्रोक्तिरलङ्कारप्रकारः सर्वः । वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कृतिः । इति वचनात् । शब्दस्य हि वक्रता अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्णेन वित ही हो रहा है, इसलिए काव्य में लोकोत्तर ही शोभा उल्लसित होती है । परन्तु अनौचित्य से शोभा समाप्त ही हो जाती है । जैसे— इस प्रकार के होने वाले तेरे स्तन के उठान को ध्यान में न रख कर ही विधाता ने आकाश को छोटा बना दिया । अतिशयोक्ति सभी अलंकारों में व्यङ्ग्यरूप से अन्तर्लीन ही है यह जो कहा है वह कैसे ? क्योंकि भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों का सामान्यरूप कहा है । सामान्य शब्द से विशेष की प्रतीति होने से पृथग्भूत होकर पश्चाद्भावी रूप से नहीं प्रतीति होता है, तो फिर कैसे इसका व्यङ्ग्यत्व है ? यह आशङ्का करके कहते हैं— भामह ने—। भामह ने भी जो कहा है वहाँ यही अर्थ समझना चाहिए यह दूर से अन्वय है । वह क्या कथन है—वह सभी—। जो अतिशयोक्ति लक्षित की गई है वही सब वक्रोक्ति अलङ्कार का सब प्रकार है । वक्र अर्थ और शब्द की उक्ति वाणी की अलंकृति मानी जाती है । स वचन से । शब्द की वक्रता और अभिधेय की वक्रता अर्थात् लोकोत्तीर्णरूप से