भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 680 में से

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पृष्ठ 560

५०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशययोगोऽन्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वी- करणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेत्ययमेवार्थोऽवग- वहाँ, अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार कवि की प्रतिभा के वश से जिस अलङ्कार पर अधिष्ठित होती है, उसमें अतिशय चारुत्व का योग्य हो जाता है और अन्य अल- ङ्कारमात्र होते हैं, इस प्रकार सभी अलङ्कारों के शरीर को अङ्गीकार की योग्यता लोचनम् रूपेणावस्थानमित्ययमेवासावलङ्कारभावः ; लोकोत्तरतैव चातिशयः, तेनातिश- योक्तिः सर्वालङ्कारसामान्यम् । तथा हि—अनया अतिशयोक्त्या, अर्थः सकल- जनोपभोगपुराणीकृतोऽपि विचित्रतया भाव्यते । तथा प्रमदोद्यानादिः विभा- वतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसमयीक्रियते, इति तावत्तेनोक्तं, तत्र कोऽसावर्थ इत्याह—अभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेति । उपचारे निमित्त- माह—सर्वालङ्कारेति । उपचारे प्रयोजनमाह—अतिशयोक्तिरित्यादिना अलङ्कार- मात्रतैवेत्यन्तेन । मुख्यार्थबाधोऽप्यत्रैव दर्शितः कविप्रतिभावशादित्यादिना । अयं भावः—यदि तावदतिशयोक्तेः सर्वालङ्कारेषु सामान्यरूपता सा तर्हि तादात्म्यपर्यवसायिनीति तद्व्यतिरिक्तो नैवालङ्कारो दृश्यत इति कविप्रतिभानं न तत्रापेक्षणीयं स्यात् । अलङ्कारमात्रं च न किञ्चिद्दृश्येत । अथ सा काव्य- जीवितत्वेनेत्थं विवक्षिता, तथाप्यनौचित्येनापि निबध्यमाना तथा स्यात् । अवस्थान, यही वह अलङ्कार का अलङ्कारत्व है । और लोकोत्तरता ही अतिशय है, इस कारण अतिशयोक्ति सब अलङ्कार का सामान्य है । जैसा कि—इस अतिशयोक्ति से, बहुत लोगों के द्वारा उपयोग करने से पुराना हुआ भी अर्थ विचित्र रूप से मालूम पड़ता है । उस प्रकार प्रमदा, उद्यान आदि को विभाव बनाते हैं । विशेषरूप से भावित किया जाता है, अर्थात् रसमय किया जाता है, यह जो उसने कहा है उसका अर्थ क्या है, इस प्रसंग में कहते हैं—अभेदोपचार से वही सर्वालङ्काररूप है । उपचार में निमित्त कहते हैं—सर्वालङ्कार—। उपचार में प्रयोजन कहते हैं—अतिशयोक्ति से लेकर अलङ्कारमात्र होते हैं तक । कवि की प्रतिभा के वश से—इत्यादि से मुख्यार्थ- बाध भी यहीं दिखा दिया गया । भाव यह है—यदि अतिशयोक्ति सभी अलङ्कारों में सामान्यरूप है और वह ( उसकी सामान्यरूपता ) तादात्म्य में पर्यवसित होती है । ( अर्थात् सभी अलङ्कार अतिशयोक्तिरूप हैं ) तो उस ( अतिशयोक्ति ) से व्यतिरिक्त अलङ्कार नहीं है, ऐसी स्थिति में कवि की प्रतिभा की अपेक्षा नहीं रह जायगी, और कोई ( अतिशयोक्ति से अतिरिक्त ) अलंकारमात्र नहीं दिखेगा । यदि वह ( अतिशयोक्ति ) काव्य का जीवितरूप से विवक्षित है, ऐसी स्थिति में भी औचित्य से भी निबन्ध्यमान होकर