भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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तृतीय उद्योतः ५०१


ध्वन्यालोकः न्तव्यः । तस्याश्चालङ्कारान्तरसंकीर्णत्वं कदाचिद्वाच्यत्वेन कदाचिद्व्य- ङ्ग्यत्वेन । व्यङ्ग्यत्वमपि कदाचित्प्राधान्येन कदाचिद्गुणभावेन । तत्राद्ये पक्षे वाच्यालङ्कारमार्गः । द्वितीये तु ध्वनावन्तर्भावः । तृतीये तु गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपता । हो जाने से अभेदोपचार से वही सर्वालङ्कार स्वरूप है, यही अर्थ समझना चाहिए । और वह अलङ्कारान्तर से सङ्कीर्ण कभी वाच्यरूप से कभी व्यङ्ग्य रूप से होती है । व्यङ्ग्यत्व भी कभी प्राधान्य से कभी गुणभाव से होता है । उनमें पहले पक्ष में वाच्य अलङ्कार का मार्ग है, दूसरे में ध्वनि में अन्तर्भाव है और तीसरे में गुणीभूत- व्यङ्ग्यरूपता है ।

लोचनम् औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यनिबन्धनं रसभावादि मुक्त्वा नान्यत्किञ्चिदस्तीति तदेवान्तर्यामि मुख्यं जीवितमित्यभ्युपगन्तव्यं न तु सा । एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमये काव्ये किमन्येन- ध्वनिनात्मभूतेनेति ते स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभ्युपगमसाक्षिभूतं मन्यमानाः प्रत्युक्ताः । तस्मान्मुख्यार्थबाधादुपचारे च निमित्तप्रयोजनसद्भावादभेदोपचार एवायम् । ततश्चोपपन्नमतिशयोक्तेर्व्यङ्ग्यत्वमिति । यदुक्तमलङ्कारान्तरस्वीकरणं तदेव त्रिधा विभजते—तस्याश्चेति । वाच्यत्वेनेति । सापि वाच्या भवति । यथा- ‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अत्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्पृगेव । अस्य त्रैवि- ध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रेति । तेषु प्रकारेषु मध्ये य आद्यः प्रकारस्तस्मिन् । वह उस प्रकार ( काव्य का जीवित ) हो सकती है । औचित्य वाली अतिशयोक्ति ( काव्य का ) जीवित है यदि कहो तो औचित्य के निबन्धन रस, भाव आदि को छोड़ कर कोई दूसरा नहीं है, इसलिए वही अन्तर्यामी होने से मुख्य जीवित है यह मानना चाहिए न कि वह ( औचित्ययुक्त अतिशयोक्ति ) । इसलिए जो कि कुछ लोग कहते हैं कि औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमय काव्य में अन्य किसी आत्मभूत ध्वनि से क्या होगा ? वे अपने वचन को ही ध्वनि के सद्भाव के स्वीकार का साक्षिभूत मानते हुए जवाब दिये जा चुके । इसलिए मुख्यार्थ के बाध से और निमित्तरूप प्रयोजन के सद्भाव से यह अभेदोपचार ही है । इसलिए अतिशयोक्ति के व्यङ्ग्य होने की बात बन गई । जो कि अलङ्कारान्त का स्वीकरण कहा है उसे ही तीन प्रकार से विभाग करते हैं—और वह अलङ्कारान्तर से—। वाच्यरूप से—। वह (अतिशयोक्ति) भी वाच्य होती है ( जैसे—‘अपरैव हि केयमत्र’ । यहाँ रूपक में भी अतिशय शब्द का स्पर्श कर ही रहा है ( अर्थात् वाच्य ही है ) इस त्रैविध्य का विषयविभाग कहते हैं—उनमें—। उन प्रकारों के बीच जो पहला प्रकार है उसमें ।