भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 680 में से

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पृष्ठ 562

५०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अयं च प्रकारोऽन्येषामप्यलङ्काराणामस्ति, तेषां तु न सर्वविषयः । अतिशयोक्तेस्तु सर्वालङ्कारविषयोऽपि सम्भवतीत्ययं विशेषः । येषु चालङ्कारेषु सादृश्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः यथा रूपकोपमातुल्ययोगिता- निदर्शनादिषु तेषु गम्यमानधर्ममुखेनैव यत्सादृश्यं तदेव शोभातिशय- शालि भवतीति ते सर्वेऽपि चारुत्वातिशययोगिनः सन्तो गुणीभूतव्य- ङ्ग्यस्यैव विषयाः । समासोक्त्याक्षेपपर्यायोक्तादिषु तु गम्यमानांशावि- नाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवादैव । तत्र च यह प्रकार अन्य अलङ्कारों का भी है, परन्तु उनका ( प्रकार ) सब विषय वाला नहीं है, परन्तु अतिशयोक्ति का ( प्रकार ) सब अलङ्कार के विषय वाला भी सम्भव होता है इस प्रकार यह विशेष है। जिन अलङ्कारों में सादृश्य के द्वारा तत्त्व ( अल- ङ्कारत्व ) का लाभ होता है, जैसे रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना आदि, उनमें गम्यमान धर्म के प्रकार से ही जो सादृश्य है वही अतिशय शोभा वाला होता है, इस प्रकार वे सभी अतिशय चारुत्व से युक्त होते हुए गुणीभूत व्यङ्ग्य के ही विषय होते हैं । किन्तु समासोक्ति, आक्षेप, पर्यायोक्त आदि में गम्यमान अंश के अविनाभाव से ही तत्त्व ( अलङ्कारत्व ) की व्यवस्था होने से गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवाद ही लोचनम् नन्वतिशयोक्तिरेव चेदेवम्भूता तत्किमपेक्षया प्रथमं तावदिति क्रमः सूचित इत्याशङ्क्याह—अयं चेति । योऽतिशयोक्तौ निरूपितोऽलङ्कारान्तरेऽप्यनुप्रवे- शात्मकः । नन्वेवमपि प्रथममिति केनाशयेनोक्तमित्याशङ्क्याह—तेषामिति । एवमलङ्कारेषु तावद्व्यङ्ग्यस्पर्शोऽस्तीत्युक्त्या तत्र किं व्यङ्ग्यत्वेन भातीति विभागं व्युत्पादयति—येषु चेति । रूपकादीनां पूर्वमेवोक्तं स्वरूपम् । निदर्शना- यास्तु 'क्रिययैव तदर्थस्य विशिष्टस्योपदर्शनम् । इष्टा निदर्शने'ति । उदाहरणम्- जब अतिशयोक्ति इस प्रकार की है तो किस अपेक्षा से 'पहले' यह क्रम सूचित किया है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—यह प्रकार—। अतिशयोक्ति में अलङ्कारान्तर में अनुप्रवेशरूप जो निरूपण किया गया है। फिर भी 'पहले' यह किस आशय से कहा है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—उनका—। इस प्रकार 'अलङ्कारों में व्यङ्ग्य का स्पर्श है' यह कह कर व्यङ्ग्यत्व से क्या होता है यह व्युत्पादन करते हैं—और जिन अलङ्कारों में—। रूपक आदि का स्वरूप पहले ही कह चुके हैं। किन्तु निदर्शना का ( लक्षण है )—'क्रिया के द्वारा ही उसके विशिष्ट अर्थ का उपदर्शन निदर्शना मानी जाती है' उदाहरण—