ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५०३ ध्वन्यालोकः गुणीभूतव्यङ्ग्यतायामलङ्काराणां केषाञ्चिदलङ्कारविशेषगर्भतायां नियमः। यथा व्याजस्तुतेः प्रेयोऽलङ्कारगर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्कारमात्रगर्भतायां नियमः। यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्काराणां परस्प- रगर्भतापि सम्भवति। यथा दीपकोपमयोः। तत्र दीपकमुपमागर्भत्वेन प्रसिद्धम्। उपमापि कदाचिद्दीपकच्छायानुयायिनी। यथा मालोपमा। तथा हि 'प्रभामहत्या शिखयेव दीपः' इत्यादौ स्फुटैव दीपकच्छाया लक्ष्यते। तदेवं व्यङ्ग्यांशसंस्पर्शे सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकादयोऽ- लङ्काराः सर्व एव गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य मार्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं च है। और उस गुणीभूतव्यङ्ग्यता में कुछ अलङ्कार नियमतः—अलङ्कार विशेषगर्भ होते हैं, जैसे व्याजस्तुति प्रेयोऽलङ्कारगर्भ होती है; कुछ (अलङ्कार) नियमतः अल- ङ्कारमात्रगर्भ होते हैं, जैसे सन्देह आदि उपमागर्भ होते हैं; कुछ अलङ्कार परस्पर गर्भ भी सम्भव होते हैं, जैसे दीपक और उपमा में वहाँ दीपक उपमागर्भ रूप से प्रसिद्ध है। उपमा भी कभी दीपक की छायानुयायिनी हो जाती है, जैसे मालोपमा। जैसा कि 'प्रभा महत्या शिखयेव दीपः' इत्यादि में स्पष्ट ही दीपक की छाया लक्षित होती है। तो इस प्रकार व्यङ्ग्यांश का संस्पर्श होने पर रूपक आदि अलङ्कार अतिशय चारुत्व से युक्त होते हैं, यह सभी गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग है। उस प्रकार की जाति लोचनम् अयं मन्दद्युतिर्भास्वानस्तं प्रति यियासति। उदयः पतनायेति श्रीमतो बोधयन्नरान् ॥ प्रेयोऽलङ्कारेति। चाटुपर्यवसायित्वात्तस्याः। सा चोदाहृतैव द्वितीयोद्द्योतेऽ- स्माभिः। उपमागर्भत्व इत्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौ- पम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव। स्फुटैवेति। 'तया स पूतश्च विभू- षितश्च' इत्येतेन दीपस्थानीयेन दीपनाद्दीपकमात्रानुप्रविष्टं प्रतीयमानतया, यह मन्द प्रकाश वाला सूर्य 'उदय पतन के लिए होता है' यह वैभवशाली लोगों को बोध कराता हुआ अस्त जाना चाहता है। प्रेयोऽलङ्कार—। क्योंकि वह (व्याजस्तुति) चाटु में पर्यवसान प्राप्त करती है। और उसे हमने दूसरे उद्योत में उदाहृत किया ही है। 'उपमागर्भ' यहां 'उपमा' शब्द से उसके सभी विशेष रूपक आदि, अथवा 'औपम्य सब में सामान्य है' इसलिए सब आक्षिप्त ही हैं। स्पष्ट हो—। 'तया स पूतश्च विभूषितश्च' इस दीपस्थानीय से दीपन होने के कारण प्रतीयमान रूप से यहां दीपक अनुप्रविष्ट है। इस उपमा में साधारण-