ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः तेषां तथाजातीयानां सर्वेषामेवोक्तानुक्तानां सामान्यम् । तल्लक्षणे सर्व वाले उन उक्त और अनुक्त सभी का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य है। उसके लक्षण में सभी ये सुष्ठु प्रकार से लक्षित हो जाते हैं । सामान्य लक्षण से रहित प्रत्येक का लोचनम् साधारणधर्माभिधानं ह्येतदुपमायां स्पष्टेनाभिधाप्रकारेणैव । तथाजातीयाना- मिति । चारुत्वातिशयवतामित्यर्थः । सुलक्षिता इति यत्किलैषां तद्विनिर्मुक्तं रूपं न तत्काव्येऽभ्यर्थनीयम् । उपमा हि ‘यथा गौस्तथा गवयः’ इति । रूपकं ‘खलेवाली यूप’ इति । श्लेषः ‘द्विर्वचनेऽची’ति तन्त्रात्मकः । यथासंख्यं ‘तुदी- शालातुरै’ति । दीपकं ‘गामश्वम्’ इति । ससन्देहः ‘स्थाणुर्वा स्यात्’ इति । अपह्नुतिः ‘नेदं रजतम्’ इति । पर्यायोक्तं ‘पीनो दिवा नात्ति’ इति । तुल्ययो- गिता ‘स्थाध्वोरिच्च’ इति । अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि, यथा पदसंज्ञा- यामन्तवचनम्— ‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’ इति । आक्षे- पश्चोभयत्र विभाषासु विकल्पात्मकविशेषाभिधित्सया इष्टस्यापि विधेः पूर्व निषेधनात्प्रतिषेधेन समीकृत इति न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’ ‘विन्ध्योवर्धितवानर्कवर्त्मगृण्हात्’ इति । एवमन्यत् । न चैवमादि काव्योपगीति, गुणीभूतव्यङ्ग्यतैवात्रालङ्कारतायां मर्मभूता लक्षिताः तान् सुष्ठु लक्ष्यति । यया सुपूर्णं कृत्वा लक्षिताः सङ्गृहीता धर्म का अभिधान स्पष्ट अभिधा प्रकार से ही है । उस प्रकार की जाति वाले—। अर्थात् अतिशय चारुत्व वाले । सुष्ठु प्रकार से लक्षित—। जो कि इन (उपमा आदि अलङ्कारों) का उस (गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व) से रहित रूप है वह काव्य में अभीष्ट नहीं है । क्योंकि उपमा—‘जैसा गौ वैसा गवय’ । रूपक—‘खलेवाली यूप है’ । श्लेष— ‘द्विर्वचनेऽचि’ तन्त्रात्मक है। यथासङ्ख्य—‘तुदीशालातुर०’। दीपक—‘गौ अश्व’। ससन्देह—‘अथवा स्थाणु होगा’ अपह्नुति—‘यह रजत नहीं है’। पर्यायोक्त—‘पीन दिन में भोजन नहीं करता है’। तुल्ययोगिता—स्थध्वोरिच्च’। अप्रस्तुतप्रशंसा—सब ज्ञापक, जैसे पदसंज्ञा में अन्तवचन—‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’। आक्षेप—विभाषाओं में दोनों जगह विकल्परूप विशेष के अभिधान की इच्छा से इष्ट भी विधि के निषेध से प्रतिषेध के समान बना हुआ’ इस न्याय से । अतिशयोक्ति— ‘कुण्डिका समुद्र है’; ‘विन्ध्य ने बढ़ कर सूर्य के मार्ग को छेक लिया’ । इस प्रकार दूसरा । इत्यादि को काव्य नहीं कहते । अलङ्कारता में मर्मभूत गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही यहाँ लक्षित होकर उन्हें सुष्ठु प्रकार से लक्षित करती है । जिस (गुणीभूतव्यङ्ग्यता से) सुपूर्ण करके लक्षित अर्थात् संगृहीत होते हैं, अन्यथा अवश्य अव्याप्ति हो जाती । उसे ।