भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 680 में से

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पृष्ठ 565

तृतीय उद्योतः ५०५ ध्वन्यालोकः एवैते सुलक्षिता भवन्ति। एकैकस्य स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्य- लक्षणरहितेन प्रतिपादपाठेनेव शब्दा न शक्यन्ते तत्त्वतो निर्ज्ञातुम्, आनन्त्यात् । अनन्ता हि वाग्विकल्पास्तत्प्रकारा एव चालङ्काराः। गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरेणापि व्यङ्ग्यार्थानुगमलक्षणेन स्वरूपविशेष कहने से तो प्रत्येक पद के पाठ से शब्दों की भांति अनन्त होने के कारण तत्त्वतःज्ञान नहीं किया जा सकता । क्योंकि वाग्विकल्प अनन्त हैं और अलङ्कार उनके प्रकार ही हैं।—गुणीभूतव्यङ्ग्य का विषय व्यङ्ग्य अर्थ के अनुगम से प्रकारान्तर लोचनम् भवन्ति, अन्यथा त्ववश्यमव्याप्तिर्भवेत् । तदाह—एकैकस्येति । न चातिशयो- क्तिवक्रोक्त्युपमादीनां सामान्यरूपत्वं चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदा- यत्तेत्येतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम् , रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्न आनन्दात्म- कत्वमिति नानवस्था काचिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता हीति । प्रथमोद्द्योत एव व्याख्यातमेतत् ‘वाग्विकल्पानामानन्त्यात्’ इत्यत्रान्तरे । ननु सर्वेष्वलङ्कारेषु नालङ्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति ; तत्कथं गुणीभूत- व्यङ्ग्येन लक्षितेन सर्वेषां संग्रहः । मैवम्; वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यं सद्गुणीभूतं भविष्यति तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य चेति । प्रकारान्तरेण वस्तु रसात्मनोपलक्षितस्य । यदि वेत्थमवतरणिका—ननु गुणीभूतव्यङ्ग्येनालङ्कारा यदि लक्षितास्तर्हि कहते हैं—प्रत्येक का—। चारुताहीन अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा आदि का सामान्य- रूपत्व बन सकता है, और चारुता इसके अधीन है, यही गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य लक्षण है और व्यङ्ग्य का चारुत्व रसाभिव्यक्ति योग्यतारूप है, इस स्वस्वरूप से ही विश्रान्तिधाम है, अतएव आनन्दात्मक है, इस प्रकार कोई अनवस्था नहीं है यह तात्पर्य है । क्योंकि अनन्त—। प्रथम उद्योत में ही 'वाग्विकल्पानामानन्त्यात्' इस प्रसंग में यह व्याख्यान किया जा चुका है । ( प्रश्न ) सब अलङ्कारों में अलङ्कारान्तर व्यङ्ग्य नहीं होता, तो गुणीभूतव्यङ्ग्य के लक्षित होने पर कैसे सभी का संग्रह होगा ? ( उत्तर ) ऐसा नहीं, वस्तुमात्र अथवा रस व्यङ्ग होता हुआ गुणीभूत होगा, उसे ही कहते हैं—गुणीभूतव्यङ्ग्य का—। वस्तु और रसरूप प्रकारान्तर से—। उपलक्षित । अथवा अवतरणिका इस प्रकार है—गुणीभूतव्यङ्ग्य से यदि अलङ्कार लक्षित हो गये तो लक्षण कहना चाहिए, फिर क्यों नहीं कहा, यह आशङ्का करके कहते हैं—