ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 566, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें५०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विषयत्वमस्त्येव । तदयं ध्वनिनिष्यन्दरूपो द्वितीयोऽपि महाकविविष- योऽतिरमणीयो लक्षणीयः सहृदयैः । सर्वथा नास्त्येव सहृदयहृदयहा- रिणः काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शेन सौभाग्यम् । तदिदं काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्भावनीयम् । मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥ ३७ ॥ से भी होता ही है । इसलिए ध्वनिनिष्यन्द रूप, महाकवियों का विषय, अतिरम- णीय दूसरा भी सहृदयों को लक्षित करना चाहिए । सहृदय हृदयहारी काव्य का वह सर्वथा प्रकार नहीं ही है जिसमें प्रतीयमान अर्थ के संस्पर्श से सौभाग्य नहीं है । तो यह उत्कृष्ट काव्यरहस्य है यह विद्वानों को समझना चाहिए । महाकवियों को अलङ्कार युक्त भी वाणी की यह प्रतीयमानकृत छाया स्त्रियों की लज्जा की भाँति मुख्य भूषा है । लोचनम् लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशङ्क्याह—गुणीभूतेति । विषयत्वमिति लक्षणीयत्वमिति यावत् । केन लक्षणीयत्वं ध्वनिव्यतिरिक्तो यः प्रकारो व्यङ्ग्य- त्वेनार्थानुगमो नाम तदेव लक्षणं तेनेत्यर्थः । व्यङ्ग्ये लक्षिते तद्गुणीभावे च निरूपिते किमन्यदस्य लक्षणं क्रियतामिति तात्पर्यम् । एवं 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' इति निर्वाह्योपसंहरति—तदयमित्यादिना सौभाग्यमित्यन्तेन । यत्प्रागुक्तं सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूतमिति तन्न प्रतारणमात्रमर्थवादरूपं मन्तव्यमिति दर्शयितुम्-तदिदमिति ॥ ३६ ॥ मुख्या भूषेति । अलङ्कृतिभृतामपिशब्दादलङ्कारशून्यानामपीत्यर्थः । प्रतीयमानकृता छाया शोभा सा च लज्जासदृशी गोपनासारसौन्दर्यप्राणत्वात् । अलङ्कारधारिणीनामपि नायिकानां लज्जा मुख्यं भूषणम् । प्रतीयमाना च्छाया गुणीभूतव्यङ्ग्य का—। विषय अर्थात् लक्षणीय । अर्थात् किससे लक्षणीय होगा, व्यङ्ग्य- रूप से अर्थानुगम नाम का ध्वनिव्यतिरिक्त जो प्रकार है वही लक्षण है उससे । व्यङ्ग्य के लक्षित होने पर और उसके गुणीभाव के निरूपण किये जाने पर दूसरा लक्षण क्या किया जाय, यह तात्पर्य है । इस प्रकार 'काव्य का आत्मा ध्वनि है' यह निर्वाह करके उपसंहार करते हैं—इसलिए—। इत्यादि से लेकर सौभाग्य तक । जो पहले कहा है कि समस्त सत्कवियों के काव्य का उपनिषदभूत है वह प्रतारणमात्र नहीं है, बल्कि अर्थवाद- रूप मानना चाहिए यह दिखाने के लिए—तो यह—॥ ३६ ॥ मुख्य भूषा—। 'अलङ्कारयुक्त भी' शब्द से 'अलङ्कारशून्य भी' यह अर्थ है । प्रतीयमानकृत छाया अर्थात् शोभा, वह लज्जा के समान है, क्योंकि गोपना के सार