भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

तृतीय उद्योतः ५०७ ध्वन्यालोकः अनया सुप्रसिद्धोऽप्यर्थः किमपि कामनीयकमानीयते । तद्यथा— विश्रम्भोत्था मन्मथाज्ञाविधाने ये मुग्धाक्ष्याः केऽपि लीलाविशेषाः । अक्षुण्णास्ते चेतसा केवलेन स्थित्वैकान्ते सन्ततं भावनीयाः ॥ इससे सुप्रसिद्ध भी अर्थ कुछ कमनीय बन जाता है । वह जैसे— मन्मथ की आज्ञा के विधान में जो मुग्धाक्षी के विश्रम्भ से उत्पन्न कुछ अपूर्व लीला-विशेष हैं, अक्षुण्ण उन्हें एकान्त में स्थित होकर केवल (एकाग्र) चित्त से भावना के योग्य हैं। लोचनम् अन्तर्मदनोद्भेदजहृदयसौन्दर्यरूपा यया, लज्जा ह्यन्तरुद्भिन्नमान्मथविकार- जुगोपयिषारूपा मदनविजृम्भैव। वीतरागाणां यतीनां कौपीनापसारणेऽपि त्रपाकलङ्कादर्शनात् । तथा हि कस्यापि कवेः—'कुरङ्गीवाङ्गानि' इत्यादिश्लोकः । तथा प्रतीयमानस्य प्रियतमाभिलाषानुनाथनमानप्रभृतेः छाया कान्तिः यया । शृङ्गाररसतरङ्गिणी हि लज्जावरुद्धा निर्भरतया तांस्तान् विलासान्नेत्रगात्र- विकारपरम्परारूपान् प्रसूत इति गोपनासारसौन्दर्यलज्जाविजृम्भितमेत- दिति भावः । विश्रम्भेति । मन्मथाचार्येण त्रिभुवनवन्द्यमानशासनेन अत एव लज्जासाध्व- सध्वंसिना दत्ता येयमलङ्घनीयाज्ञा तदनुष्ठानेऽवश्यकर्तव्ये सति साध्वसलज्जा- त्यागेन विश्रम्भसम्भोगकालोपनताः, मुग्धाक्ष्या इति अकृतकसम्भोगपरिभाव- सौन्दर्य का प्राण है। अलङ्कार धारण करने वाली भी नायिकाओं की लज्जा मुख्य भूषण है। अन्तर्मदन के उद्भेद से उत्पन्न सौन्दर्यरूप छाया प्रतीयमान हो जिससे, क्योंकि लज्जा भीतर उद्भिन्न मान्मथविकार की गोपनेच्छारूप मदनजृम्भा ही है। क्योंकि वीतराग यतियों के कौपीन हटा देने पर भी त्रपा का कलङ्क नहीं दिखता। जैसा कि किसी कवि का—'कुरङ्गीवाङ्गानि०' इत्यादि श्लोक। उस प्रकार प्रतीयमान प्रियतम के अभिलाप, अनुनाथन प्रभृति की छाया अर्थात् कान्ति है जिससे। भाव यह कि शृङ्गार रस की तरङ्गिणी लज्जा से अवरुद्ध होकर नेत्र और गात्र के विकार परम्परा- रूप उन-उन विलासों को उत्पन्न करती है, इस प्रकार यह गोपनारूप द्वार वाले सौन्दर्यवाली लज्जा का विजृम्भित है । मन्मथ की—। त्रिभुवन द्वारा वन्द्यमान शासन वाले, अतएव लज्जा और साध्वस के ध्वंस कर देने वाले मन्मथाचार्य की दी हुई जो यह अलङ्घनीय आज्ञा है उसके अनुष्ठान अर्थात् अवश्यकर्तव्य की अवस्था में साध्वस और लज्जा के त्याग से विश्रम्भ- सम्भोग के अवसर में प्राप्त, मुग्धाक्षी के—अकृत्रिम सम्भोग के परिभावन से उचित