भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 680 में से

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पृष्ठ 568

५०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यत्र केऽपीत्यनेन पदेन वाच्यमस्पष्टमभिदधता प्रतीयमानं वस्त्वक्लिष्टमनन्तमर्पयता का छाया नोपपादिता । अर्थान्तरगतिः काक्वा या चैषा परिदृश्यते । सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे प्रकारमिममाश्रिता ॥ ३८ ॥ यहाँ वाच्य का अस्पष्ट अभिधान करते हुए 'कुछ' इस पद ने अक्लिष्ट और अनन्त प्रतीयमान को अर्पित करते हुए कौन शोभा उत्पन्न नहीं की है ? और काकु से जो यह अर्थान्तर की गति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य के गुणीभाव होने पर इस प्रकार को आश्रयण करती है ॥ ३८ ॥ लोचनम् नोचितदृष्टिप्रसरपवित्रिता येऽन्ये विलासा गात्रनेत्रविकाराः, अत एवाक्षुण्णाः नवनवरूपतया प्रतिक्षणमुन्मिषन्तस्ते, केवलेनान्यत्राव्यग्रेणैकान्तावस्थानपूर्वं सर्वेन्द्रियोपसंहारेण भावयितुं शक्या अर्हा उचिताः । यतः केऽपि नान्येनो- पायेन शक्यनिरूपणाः ॥ ३७ ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्यस्योदाहरणान्तरमाह—अर्थान्तरेति । 'कक लौल्ये' इत्यस्य धातोः काकुशब्दः । तत्र हि साकाङ्क्षनिराकाङ्क्षादिक्रमेण पठ्यमानोऽसौ शब्दः प्रकृतार्थातिरिक्तमपि वाञ्छतीति लौल्यमस्याभिधीयते । यदि वा ईषदर्थे कुशब्दस्तस्य कादेशः । तेन हृदयस्थवस्तुप्रतीतेरीषद्भूमिः काकुः तया याऽर्थान्तरगतिः स काव्यविशेष इमं गुणीभूतव्यङ्ग्यप्रकारमाश्रितः । अत्र हेतुर्व्यङ्ग्यस्य तत्र गुणीभाव एव भवति । अर्थान्तरगतिशब्देनात्र काव्यमेवो- दृष्टिप्रसार द्वारा पवित्रित जो अन्य गात्र और नेत्र के विकाररूप विलास हैं, अतएव अक्षुण्ण अर्थात् नवनवरूप से प्रतिक्षण उन्मिषित हो रहे हैं, उन्हें केवल अर्थात् अन्यत्र व्यग्रतारहित, एकान्त में अवस्थानपूर्वक समस्त इन्द्रियों का उपसंहार करके भावना के योग्य, उचित हैं । क्योंकि 'कुछ अपूर्व' है अर्थात् अन्य उपाय से निरूपण नहीं किए जा सकते ॥ ३७ ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्य का अन्य उदाहरण कहते हैं—और काकु—। कक लौल्ये' इस धातु का 'काकु' शब्द है । वहां साकांक्ष और निराकांक्ष आदि क्रम से पढ़ा गया वह शब्द प्रकृत अर्थ से अतिरिक्त की भी इच्छा करता है यह इसका 'लौल्य' प्रकट करता है । अथवा 'ईषत्' अर्थ में 'कु' शब्द है, उसका 'का' आदेश है । इसलिए हृदयस्थ वस्तु की प्रतीति की ईषद् भूमि काकु है, उससे जो अर्थान्तर की प्रतीति है वह काव्यविशेष इस गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार का आश्रयण करता है। यहां हेतु वहां व्यङ्ग्य का गुणीभाव ही होता है । 'अर्थान्तरगति' शब्द से यहां काव्य ही कहा गया है । यहां