भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 680 में से

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पृष्ठ 569

तृतीय उद्योतः ५०९ ध्वन्यालोकः या चैषा काक्का क्वचिदर्थान्तरप्रतीतिर्दृश्यते सा व्यङ्ग्यस्यार्थस्य गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यलक्षणं काव्यप्रभेदमाश्रयते । यथा— ‘स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः’ । यथा वा—आम असइओ̆ ओरम पडिव्वए ण तुएँ मलिणिअं सीलम् । और जो यह काकु से कहीं पर अर्थान्तर की प्रतीति देखी जाती है वह व्यङ्ग्य अर्थ के गुणीभाव होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप काव्य प्रभेद का आश्रयण करती है । जैसे—'मेरे जीते जी धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हो जांए !' अथवा जैसे— हाँ, हम तो बदचलन हैं, रुक जा, री पतिव्रता, तूने आबरू को मैला नहीं लोचनम् च्यते । न तु प्रतीतेरत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं वक्तव्यं, प्रतीतिद्वारेण वा काव्यस्य निरूपितम् । अन्ये त्वाहुः—व्यङ्ग्यस्य गुणीभावेऽयं प्रकारः अन्यथा तु तत्रापि ध्वनि- त्वमेवेति । तच्चासत्; काकुप्रयोगे सर्वत्र शब्दस्पृष्टत्वेन व्यङ्ग्यस्योन्मीलित- स्यापि गुणीभावात्, काकुर्हि शब्दस्यैव कश्चिद्धर्मस्तेन स्पृष्टं ‘गोप्यैवं गदितः सलेशम्’ इति, ‘हसन्नेत्रार्पिताकूतम्’ इतिवच्छब्देनैवानुगृहीतम् । अत एव ‘भम धम्मिअ’ इत्यादौ काकुयोजने गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव व्यक्तोक्तत्वेन तदाभि- मानाल्लोकस्य । स्वस्था इति, भवन्ति इति, मयि जीवति इति, धातैराष्ट्रा इति च साकाङ्क्षदीप्तगद्गदतारप्रशमनोद्दीपनचित्रिता काकुरसम्भाव्योऽयमर्थोऽत्यर्थ- मनुचितश्चेत्यमुं व्यङ्ग्यमर्थं स्पृशन्ती तेनैवोपकृता सती क्रोधानुभावरूपतां व्यङ्ग्योपस्कृतस्य वाच्यस्यैवाधत्ते । आमेति । प्रतीति का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व नहीं कहना चाहिए, अथवा प्रतीति के द्वारा काव्य का ( गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ) निरूपण किया है । किन्तु अन्य लोग कहते हैं—‘व्यङ्ग्य का गुणीभाव होने पर यह प्रकार है, अन्यथा वहां भी ध्वनित्व ही है’ । वह ठीक नहीं ; क्योंकि काकु के प्रयोग में सभी जगह शब्दस्पृष्ट होने के कारण उन्मीलित भी व्यङ्ग्य का गुणीभाव हो जाता है । काकु शब्द का ही कोई धर्म है, उससे स्पृष्ट ‘गोप्यैवं गदितः सलेशं’ और ‘हसन्नेत्रार्पिताकूतं’ की भांति शब्द से ही अनुगृहीत होता है । इसीलिए ‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में काकु की योजना करने पर गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ही व्यक्त होगा, तब उक्त रूप से लोग समझेंगे । ‘स्वस्थ’ ‘हो जांए’ ‘मेरे जीते जी’ ‘धार्तराष्ट्र’ इस साकांक्ष, दीप्त, गद्गद, तार, प्रशमन, और उद्दीपन से चित्रित काकु ‘यह अर्थ असम्भाव्य है और अत्यन्त अनुचित है’ इस व्यङ्ग्य अर्थ का स्पर्श करती हुई उसी के द्वारा उपकृत होती हुई व्यङ्ग्य से उपस्कृत