ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः किं उण जणस्स जाअ व्व चन्दिलं तं ण कामेमो ॥ शब्दशक्तिरेव हि स्वाभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तकाकुसहाया सत्यर्थ- विशेषप्रतिपत्तिहेतुर्न काकुमात्रम् । विषयान्तरे स्वेच्छाकृतात्काकुमात्रा त्तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवात् । स चार्थः काकुविशेषसहायशब्दव्यापा- रोपारूढोऽप्यर्थसामर्थ्यलभ्य इति व्यङ्ग्ग्यरूप एव । वाचकत्वानुगमनेनैव किया, और फिर हम तो ( किसी ) आदमी की पत्नी की तरह उस नाई को नहीं चाहतीं । शब्द शक्ति ही अपने अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त काकु की सहायता से अर्थ- विशेष की प्रतिपत्ति का हेतु है न कि काकुमात्र । क्योंकि विषयान्तर में स्वेच्छा से प्रयुक्त काकुमात्र से उस प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति सम्भव नहीं । और वह अर्थ काकुविशेष की सहायता वाले शब्द के व्यापार से उपारूढ होकर भी अर्थ की सामर्थ्य लोचनम् आम् असत्यः उपरम पतिव्रते न त्वया मलिनितं शीलम् । किं पुनर्जनस्य जायेव नापितं तं न कामयामहे ॥ इति च्छाया। आम् असत्यो भवामः इत्यभ्युपगमकाकुः साकाङ्क्षोपहासा । उपरमेति निराकाङ्क्षतया सूचनागर्भा। पतिव्रते इति दीप्तस्मितयोगिनी। न त्वया मलिनितं शीलमिति सगद्गदाकाङ्क्षा। किं पुनर्जनस्य जायेव मन्मथा- न्धीकृता, चन्दिलं नापितमिति पामरप्रकृतिं न कामयामहे इति निराकाङ्क्षग- द्गदोपहासगर्भा। एषा हि कयाचिन्नापितानुरक्तया कुलवध्वा दृष्टाविनयाया उपहास्यमानायाः प्रत्युपहासावेशगर्भोक्तिः काकुप्रधानैवेति। गुणीभावं दर्शयितुं शब्दस्पृष्टतां तावत्साधयति—शब्दशक्तिरेवेत्यादिना। नन्वेवं व्यङ्ग्यत्वं कथमित्याशङ्क्याह—स चेति। अधुना गुणीभावं दर्शयति—वाचकत्वेति। वाच्य की ही क्रोध के अनुभावरूपता का आधान करती है। हां हम तो—। 'हां हम बदमाश औरतें हैं' अभ्युपगम काकु आकांक्षा और उपहास के सहित है। 'रुक जा' यह निराकांक्ष होने के कारण सूचनगर्भ ( काकु ) है । 'री पतिबरता' यह दीप्त स्मित से युक्त है, 'तूने आबरू को मैला नहीं किया' यह गद्गद भाव और आकांक्षा से युक्त है, 'और फिर किसी आदमी की पत्नी की तरह चन्दिल अर्थात् नाई को हम नहीं चाहतीं' यह निराकांक्ष गद्गदभाव एवं उपहास से युक्त है। यह किसी नाई से फंसी कुलवधू द्वारा अविनय देखकर खिल्ली उड़ाई गई किसी ( नायिका ) की प्रत्युपहास के आवेश से युक्त उक्ति है, काकुपूर्ण ही है। गुणीभाव को दिखाने के लिए शब्द के स्पर्श को सिद्ध कर रहे हैं—शब्दशक्ति ही इत्यादि से। तो इस प्रकार व्यङ्ग्यत्व कैसे होगा ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और वह अर्थ—। अब गुणीभाव को दिखाते