ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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तृतीय उद्योतः ५११
ध्वन्यालोकः
तु यदा तद्विशिष्टवाच्यप्रतीतिस्तदा गुणीभूतव्यङ्ग्यतया तथाविधार्थ-
द्योतिनः काव्यस्य व्यपदेशः । व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्याभिधायिनो हि
गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वम् ।
प्रभेदस्यास्य विषयो यश्च युक्त्या प्रतीयते ।
विधातव्या सहृदयैर्न तत्र ध्वनियोजना ॥ ३९ ॥
से प्राप्त है, इसलिए व्यङ्ग्यरूप ही है। परन्तु जब उस (व्यङ्ग्य) विशिष्ट वाच्य की
प्रतीति वाचकत्व के अनुगम से ही होती है तब उस प्रकार का अर्थ द्योतन करनेवाले
काव्य का गुणीभूत व्यङ्ग्यरूप से व्यपदेश होता है। क्योंकि उस (व्यङ्ग्य) से विशिष्ट
वाच्य का अभिधान करनेवाला गुणीभूतव्यङ्ग्य है।
और जो विषय इस प्रभेद का युक्ति से प्रतीत होता है वहां सहृदयों को ध्वनि
की योजना नहीं करनी चाहिए ॥ ३९ ॥
लोचनम्
वाचकत्वेऽनुगमो गुणत्वं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावस्य व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतीत्या
तत्रैव काव्यस्य प्रकाशकत्वं कल्प्यते; तेन च तथा व्यपदेश इति काकुयोजनायां
सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव । अत एव 'मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्'
इत्यादौ विपरीतलक्षणां य आहुस्ते न सम्यक्परामृशुः । यतोऽत्रोच्चारणकाल
एव 'न कोपात्' इति दीप्ततारगद्गदसाकाङ्क्षकाकुबलान्निषेधस्य निषिध्यमानतयैव
युधिष्ठिराभिमतसन्धिमार्गाक्षमारूपत्वाभिप्रायेण प्रतिपत्तिरिति मुख्यार्थबाधा-
द्यनुसरणविघ्नाभावात्को लक्षणाया अवकाशः । 'दर्श यजेत' इत्यत्र तु तथाविध-
काक्वायुपायान्तराभावाद्भवतु विपरीतलक्षणा इत्यलमवान्तरेण बहुना ॥ ३८ ॥
अधुना संकीर्णं विषयं विभजते-प्रभेदस्येति । युक्त्येति । चारुत्वप्रतीति-
हैं—परन्तु जब—। वाचकत्व में अनुगम अर्थात् व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव का गुणत्व है,
व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति से वहीं पर काव्य का प्रकाशकत्व माना जाता है, और
इसलिए उस प्रकार व्यपदेश होता है, इस प्रकार काकु की योजना में सर्वत्र गुणीभूत-
व्यङ्ग्यता ही है । अतएव 'मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्' इत्यादि में जिन्होंने
विपरीत लक्षणा कही है, उन्होंने सम्यक् परामर्श नहीं किया है। क्योंकि यहां उच्चारण-
काल में ही 'न कोपात्' इस दीप्त, तार, गद्गद और साकांक्ष काकु के बल से निषेध
का निषिध्यमानरूप से ही युधिष्ठिर के अभिमत सन्धि के मार्ग के अक्षम्यत्व के
अभिप्राय से प्रतीति हो जाती है, इस प्रकार मुख्यार्थबाध आदि के अनुसरण का विघ्न
न होने के कारण लक्षणा का अवकाश कहां ? परन्तु दर्श यजेत' (दर्श अर्थात् अमा-
वास्या में याग करे ) इस स्थल में उस प्रकार के काकु आदि उपायान्तर के न होने से
विपरीतलक्षणा हो सकती है। बहुत अवान्तर चर्चा व्यर्थ है ॥ ३८ ॥
अब सङ्कीर्ण विषय का विभाग करते हैं—और जो विषय—। युक्ति से—। यहां