भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 572

५१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सङ्कीर्णो हि कश्चिद्‌ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च लक्ष्ये दृश्यते मार्गः। तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन व्यपदेशः कर्तव्यः। न सर्वत्र ध्वनिरागिणा भवितव्यम्। यथा— पत्युः शिरश्चन्द्रकलामेनने स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम्। सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान॥ यथा च— प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता। लक्ष्य में कुछ मार्ग ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का सङ्कीर्ण देखा जाता है। वहां जिसके साथ युक्ति हो वहां उससे व्यपदेश करना चाहिए। सर्वत्र ध्वनि का पक्षपाती नहीं होना चाहिए। जैसे— 'पति के सिर की चन्द्रकला को इससे स्पर्श करना' (यह कह कर) सखी द्वारा परिहासपूर्वक चरणों को रंग कर असीसी गई उस (पार्वती) ने बिना कुछ कहे माल्य से उस (सखी) को मारा। और जैसे— ऊँचे से फूल देते हुए प्रियतम से विपक्ष (सौत) का नाम लिए जाने पर मानिनी लोचनम् रेवात्र युक्तिः। पत्युरिति। अनेनेति। अलक्तकोपरक्तस्य हि चन्द्रमसः परभाग- लाभोऽनवरतपादपतनप्रसादनैर्विना न पत्युर्झटिति यथेष्टानुवर्तिन्या भाव्य- मिति चोपदेशः। शिरोधृता या चन्द्रकला तामपि परिभवेति सपत्नीलोकाप- जय उक्तः। निर्वचनमिति। अनेन लज्जावहित्थहर्षेर्ष्यासाध्वससौभाग्याभिमानप्रभृति य- द्यपि ध्वन्यते, तथापि तन्निर्वचनशब्दार्थस्य कुमारीजनोचितस्याप्रतिपत्तिलक्षण- स्यार्थस्योपकारकत्वं केवलमाचरति। उपस्कृतस्त्वर्थः शृङ्गाराङ्गतामेतीति। प्रयच्छतेति। उच्चैरिति। उच्चैर्यानि कुसुमानि कान्तया स्वयं ग्रहीतुमश- चारुत्वप्रतीति ही युक्ति है। पति के—। इससे—। आलते से रंगे हुए चन्द्रमा को दूसरे (चरण) के भाग (अंश) का लाभ करना अर्थात् निरन्तर पैरों पर गिर कर प्रसादन के बिना झट से पति की इच्छा के अनुकूल मत चलना, यह उपदेश है। सिर पर रखी हुई जो चन्द्रकला है उसे भी परिभूत करो, इस प्रकार सपत्नी जन का पराजय कहा है। बिना कुछ कहें—। इससे यद्यपि लज्जा, अवहित्य, हर्ष, ईर्ष्या, साध्वस, सौभाग्याभिमान ध्वनित होते हैं तथापि वे कुमारी जन के उचित 'बिना कुछ कहे' शब्द के अर्थ अप्रतिपत्तिरूप अर्थ के उपकारक हो जाते हैं। और उपस्कृत अर्थ शृङ्गार का अङ्ग बन जाता है। ऊँचे से—। अर्थात् जो फूल ऊंची डाल पर थे प्रियतमा ने स्वयं ग्रहण करने में