भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 680 में से

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पृष्ठ 573

तृतीय उद्योतः ५१३ ध्वन्यालोकः न किञ्चिदूचे चरणेन केवलं लिलेख बाष्पाकुललोचना भुवम् ॥ इत्यत्र ‘निर्वचनं जघान’ ‘न किञ्चिदूचे’ इति प्रतिषेधमुखेन व्य- ङ्ग्यस्यार्थस्योक्त्या किञ्चिद्विषयीकृतत्वाद् गुणीभाव एव शोभते । यदा वक्रोक्तिं विना व्यङ्ग्योऽर्थस्तात्पर्येण प्रतीयते तदा तस्य प्राधान्यम् । यथा ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ इत्यादौ । इह पुनरुक्तिर्भङ्ग्यास्तीति वाच्य- स्यापि प्राधान्यम् । तस्मान्नात्रानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यपदेशो विधेयः । ने कुछ नहीं कहा, केवल वाष्प से आकुल आँखों वाली चरण से जमीन कुरेदने लगी । यहां ‘बिना कुछ कहे मारा’ ‘कुछ नहीं बोली’ इस प्रतिषेध के द्वारा व्यङ्ग्य अर्थ का उक्ति द्वारा कुछ विषय कर दिए जाने के कारण गुणीभाव ही शोभता है । जब वक्रोक्ति के बिना व्यङ्ग्य अर्थ तात्पर्य से प्रतीत होता है तब उसका प्राधान्य है । जैसे ‘एवं वादिनि देवर्षों’ इत्यादि में । यहां भङ्गी से उक्ति है इसलिए वाच्य का भी प्राधान्य है । इसलिए यहाँ अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का व्यपदेश नहीं करना चाहिए । लोचनम् क्यत्वाद्याचिनानीत्यर्थः । अस्मदुपाध्यायास्तु हृद्यतमानि पुष्पाणि अमुके, गृहाण गृहाणेत्युच्चैस्तारस्वरेणादरातिशयार्थं प्रयच्छता । अत एव लम्भितेति । न किंचिदिति । एवं विधेषु शृङ्गारावसरेषु तामेवायं स्मरतीति मानप्रदर्शनमेवात्र न युक्तमिति सातिशयमन्युसंभारो व्यङ्ग्यो वचननिषेधस्यैव वाच्यस्य संस्कारः । तद्वक्ष्यति-उक्तिर्भङ्ग्यास्तीति । तस्येति व्यङ्ग्यस्य । इहेति पत्युरि- त्यादौ । वाच्यस्यापीति । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । प्राधान्यमपि भवति वाच्यस्य, रसाद्यपेक्षया तु गुणतापीत्यर्थः । अत एवोपसंहारे ध्वनिशब्दस्य विशेषण- मुक्तम् ॥ ३६ ॥ असमर्थ होकर याचना की । परन्तु हमारे उपाध्याय ( कहते हैं कि ) अरी अमुके ! इन अच्छे फूलों को ले, ले’ इस प्रकार ऊंचे तारस्वर से अतिशय आदर के लिए देते हुए । अतएव ‘लम्भिता’ । ‘कुछ नहीं’ । इस प्रकार के शृङ्गार के अवसरों में उसे ही यह स्मरण करता है, इसलिए यहां मानप्रदर्शन ही ठीक नहीं, इस व्यङ्ग्य सातिशय मन्युभार वचननिषेधरूप वाच्य का ही संस्कार ( क ) है । उसे कहेंगे—उक्ति भङ्गी से है— । उसका अर्थात् व्यङ्ग्य का । यहां ‘पत्युः’ इत्यादि में । वाच्य का भी—। ‘भी’ शब्द भिन्नक्रम है । अर्थात् वाच्य का प्राधान्य भी होता है, किन्तु रसादि की अपेक्षा से गुणता भी होती है । अतएव उपसंहार में ध्वनि शब्द का विशेषण (अनुरणनरूपव्यङ्ग्य) कहा है ॥ ३९ ॥ ३३ ध्व०

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