भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 680 में से

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पृष्ठ 574

५१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । धत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि काव्यप्रकारो रसभावादितात्पर्यालोचने पुनर्ध्वनिरेव सम्पद्यते । यथात्रैवानन्तरोदाहृते श्लोकद्वये । यथा च— दुराराधा राधा सुभग यदनेनापि मृजत- यह गुणीभूतव्यङ्ग्य भी प्रकार रसादि के तात्पर्य के पर्यालोचन से पुनः ध्वनि- रूप हो जाता है ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्य भी काव्य का प्रकार रसभावादि के तात्पर्य के पर्यालोचन करने पर पुनः ध्वनि ही बन जाता है । जैसे यहीं अभी उदाहृत दोनों श्लोकों में । और जैसे— 'हे सुभग, जो कि प्राणेश्वरी के इस जघन ( सुरतकालीन ) वस्त्र से भी गिरे लोचनम् एतदेव निर्वाहयन् काव्यात्मत्वं ध्वनेरेव परिदीपयति-प्रकार इति । श्लोकद्वय इति तुल्यच्छायं यदुदाहृतं पत्युरित्यादि तत्रेति द्वयशब्दादेवंवादिनोत्यस्यानव- काशः । दुराराधेति । अकारणकुपिता पादपतिते मयि न प्रसीदसि अहो दुराराधासि मा रोदीरित्युक्तिपूर्वं प्रियतमेऽश्रूणि मार्जयति इयमस्या अभ्युपग- मगर्भोक्तिः । सुभगेति । प्रियया यः स्वसंभोगभूषणविहीनः क्षणमपि मोक्तुं न पार्यसे । अनेनापीति । पश्येदं प्रत्यक्षेणेत्यर्थः । तदेव च यदेवमादृतं यत् लज्जा- दित्यागेनाप्येवं धार्यते । मृजत इत्यनेन हि प्रत्युत स्रोतस्सहस्रवाही बाष्पो भवति । इयञ्च त्वं हतचेतनो यन्मां विस्मृत्य तामेव कुपितां मन्यसे । अन्यथा इसे ही निर्वाह करते हुए ( कारिकाकार ) ध्वनि को ही काव्य का आत्मा प्रकाशित करते हैं—यह गुणीभूत—। दोनों श्लोकों में—। समान छायावाला जो उदाहृत है 'पत्युः'० इत्यादि, तहां, । 'दो' शब्द 'एवं वादिनि' इस श्लोक का अवसर नहीं । हे सुभग—। बिना कारण के कुपित तू पैरों पर गिरने पर भी मुझ पर प्रसन्न नहीं होती, हन्त दुराराधा अर्थात् प्रसन्न होने वाली नहीं है, मत रो' यह कह कर प्रियतम जब आंसू पोछने लगे तब उसकी यह अभ्युपगमगर्भ उक्ति है । सुभग—। अपने सम्भोग के भूषणों से विहीन जो तुम प्रियतमा द्वारा क्षणभर भी छोड़े नहीं जाते । इस··· से भी—। अर्थात् इसे प्रत्यक्ष देख लो । जो कि उसे जिसे आदरपूर्वक लज्जा आदि का त्याग करके भी धारण कर रहे हो। पोंछने से—। इससे बल्कि बाष्प हजारों स्रोतों में बहता है । इतना भी तुम्हें होश नहीं कि जो मुझे छोड़ कर उस

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