भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 680 में से

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पृष्ठ 575

तृतीय उद्योतः ५१५ ध्वन्यालोकः स्तवैतत्प्राणेशाजघनवसनेनाश्रु पतितम् । कठोरं स्त्रीचेतस्तदलमुपचारैर्विरम हे क्रियात्कल्याणं वो हरिरनुनयष्वेवमुदितः ॥ हुए आँसू को तुम्हारे पोंछने से राधा प्रसन्न होने वाली नहीं है । स्त्री का चित्त कठोर होता है, उपचार व्यर्थ हैं, बस करो' इस प्रकार अनुनय के ( अवसरों में राधा द्वारा ) कहे गये कृष्ण आप लोगों का कल्याण करें । लोचनम् कथमेवं कुर्याः । पतितमिति । गत इदानीं रोदनावकाशोऽपीत्यर्थः । यदि तूच्यते इयताप्यादरेण किमिति कोपं न मुञ्चसि, तत्किं क्रियते कठोरस्वभावं स्त्रीचेतः । स्त्रीति हि प्रेमाप्रयोगाद्वस्तुविशेषमात्रमेतत्; तस्य चैष स्वभावः, आत्मनि चैतत्सुकुमारहृदया योषित इति न किञ्चिद्वज्रसाराधिकमासां हृदयं यदेवंविध- वृत्तान्तसाक्षात्कारेऽपि सहस्रधा न दलति । उपचारैरिति । दाक्षिण्यप्रयुक्तैः । अनुनयेष्विति बहुवचनेन वारं वारमस्य बहुवल्लभस्येयमेव स्थितिरिति सौभाग्यातिशय उक्तः । एवमेष व्यङ्ग्यार्थसारो वाच्यं भूषयति । तत्त वाच्यं भूषितं सद्दीर्ष्याविप्रलम्भाङ्गत्वमेतीति । यस्तु त्रिष्वपि श्लोकेषु प्रतीयमानस्यैव रसाङ्गत्वं व्याचष्टे स्म । स देवं विक्रीय तद्यात्रोत्सवमकार्षीत् । एवं हि व्यङ्ग्य- स्य या गुणीभूतता प्रकृता सैव समूलं त्रुट्येत् । रसाद्यतिरिक्तस्य हि व्यङ्ग्य- स्य रसाङ्गभावयोगित्वमेव प्राधान्यं नान्यत्किञ्चिदित्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन । कुपिता को ही मानते हो, अन्यथा ऐसा तुम क्यों करते ! गिरे हुए—। अर्थात् अब तो रोने का समय भी नहीं रहा । यदि कहते हो कि इतने आदर से भी कोप का त्याग क्यों नहीं करती तो क्या करूं स्त्री का चित्त कठोर स्वभाव का होता है । स्त्री यह प्रेम का योग न होने से वस्तुमात्र है, और उस ( वस्तुमात्र ) का यह स्वभाव । अपने में ( यह सोचना ) कुछ नहीं कि स्त्रियां सुकुमार हृदय की होती हैं, इनका हृदय वज्रसार से भी अधिक ( कठोर ) होता है क्योंकि इस प्रकार के वृत्तान्त का साक्षात्कार होने पर भी हजार टुकड़े नहीं हो जाता । उपचार दाक्षिण्यप्रयुक्त । अनुनय के अवसरों में इस बहुवचन से इस बहुवल्लभ की वार-बार की यही स्थिति है, यह अतिशय सौभाग्य कहा है । इस प्रकार यह व्यङ्ग्यार्थ का सार वाच्य को अलङ्कृत करता है । वह वाच्य भूषित होकर ईर्ष्याविप्रलम्भ का अङ्ग हो जाता है । जिसने कि 'तीनों श्लोकों में प्रतीयमान ही रस का अङ्ग है' यह व्याख्यान किया है उसने देवता को बेच कर उनकी यात्रा का उत्सव मनाया है । क्योंकि इस प्रकार ( व्याख्यान करने पर ) जो व्यङ्ग्य की गुणीभूतता प्रकृत है वही समूल टूट जायगी । रसादि से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य का रस का अङ्गभाव प्राप्त करना ही प्राधान्य है, दूसरा कुछ नहीं । पूर्वजों के साथ विवाद व्यर्थ है !

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