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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 576

५१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

एवं स्थिते च 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादिश्लोकनिर्दिष्टानां पदानां व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतिपादनेऽप्येतद्वाक्यार्थीभूतरसापेक्षया व्यञ्जकत्वमुक्तम् । न तेषां पदानामर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिभ्रमो विधातव्यः, विवक्षितवाच्यत्वात्तेषाम् । तेषु हि व्यङ्ग्यविशिष्टत्वं वाच्यस्य प्रतीयते न तु व्यङ्ग्यरूपपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनिः, पदानि तु गुणीभूतव्यङ्ग्यानि । न च केवलं गुणीभूतव्यङ्ग्या- न्येव पदान्यलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनेर्व्यञ्जकानि यावदर्थान्तरसंक्रमित- वाच्यानि ध्वनिप्रभेदरूपाण्यपि । यथात्रैव श्लोके रावण इत्यस्य प्रभेदा- न्तररूपव्यञ्जकत्वम् । यत्र तु वाक्ये रसादितात्पर्यं नास्ति गुणीभूत- व्यङ्ग्यैः पदैरूल्लासितेऽपि तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव समुदायधर्मः ।

इस प्रकार स्थित होने पर 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकों में निर्दिष्ट पदों का व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य के प्रतिपादन में इसके वाक्यार्थीभूत रस की अपेक्षा से व्यञ्ज- कत्व कहा है। उन पदों में अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यध्वनि का भ्रम नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे विवक्षितवाच्य होते हैं। उनमें वाच्य का व्यङ्ग्यविशिष्टत्व प्रतीत होता है न कि व्यङ्ग्यरूप में परिणतत्व (प्रतीत होता है)। इसलिए वाक्य वहां ध्वनिरूप है और पद गुणीभूतव्यङ्ग्य हैं। केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य ही पद अलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्य ध्वनि के व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि ध्वनि के भेदरूप अर्थान्तरसङ्क्रमित- वाच्य भी। जैसे इसी श्लोक में 'रावण' इस पद का प्रभेदान्तररूप का व्यञ्जकत्व है। परन्तु जिस वाक्य में रसादि में तात्पर्य नहीं है, गुणीभूतव्यङ्ग्य पदों से उल्लसित भी उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही समुदाय का धर्म है।

लोचनम्

एवं स्थित इति। अनन्तरोक्तेन प्रकारेण ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्विभागे स्थिते सतीत्यर्थः। कारिकागतमपिशब्दं व्याख्यातुमाह-न चेति। एष च श्लोकः पूर्वमेव व्याख्यात इति न पुनर्लिख्यते। यत्र त्विति। यद्यपि चात्र विषयनिर्वेदात्मकशान्तरसप्रतीतिरस्ति, तथापि चमत्कारोऽयं वाच्यनिष्ठ एव।

इस प्रकार स्थित—। अर्थात् अनन्तरोक्त प्रकार से ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का विभाग स्थित होने पर। कारिकागत 'भी' शब्द का व्याख्यान करने के लिए कहते हैं— केवल—। यह श्लोक पहले ही व्याख्यात हो चुका है, इसलिए फिर नहीं लिखते हैं। जिस वाक्य में—। यद्यपि यहां विषय के प्रति निर्वेदरूप शान्तरस की प्रतीति होती है तथापि यह चमत्कार वाक्य में ही है। असम्भाव्यत्व, विपरीतकारित्वादि व्यङ्ग्य