ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५१७ ध्वन्यालोकः यथा— राजानमपि सेवन्ते विषममप्युपयुञ्जते । रमन्ते च सह स्त्रीभिः कुशलाः खलु मानवाः ॥ इत्यादौ । वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्यविवेके परः प्रयत्नो विधातव्यः, येन ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोरलङ्काराणां चासङ्कीर्णो विषयः सुज्ञातो भवति । अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्कारविषय एव व्यामोहः प्रव- र्त्तते । यथा— जैसे—राजाओं की भी सेवा करते हैं, विष का भी भक्षण करते हैं और स्त्रियों के साथ भी रमण करते हैं, मानव बड़े कुशल होते हैं। इत्यादि में । वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य के विवेक में अधिक प्रयत्न करना चाहिए, जिससे ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का तथा अलङ्कारों का असङ्कीर्ण विषय सुविदित होता है । अन्यथा अलङ्कार के प्रसिद्ध विषय में ही व्यामोह हो जाता है। जैसे— लोचनम् व्यङ्ग्यं त्वसम्भाव्यत्वविपरीतकारित्वादि तस्यैवानुयायि, तच्चापिशब्दाभ्यामु- भयतो योजिताभ्यां चशब्देन स्थानत्रययोजितेन खलुशब्देन चोभयतो योजि- तेन मानवशब्देन स्पष्टमेवेति गुणीभूतम् । विवेकदर्शना चेयं न निरुपयोगिनीति दर्शयति—वाच्यव्यङ्ग्ययोरिति । अलङ्काराणां चेति । यत्र व्यङ्ग्यं नास्त्येव तत्र तेषां शुद्धानां प्राधान्यम् । अन्यथा त्विति । यदि प्रयत्नवता न भूयत इत्यर्थः । व्यङ्ग्यप्रकारस्तु यो मया पूर्वमुत्प्रेक्षितस्तस्यासंदिग्धमेव व्यामोहस्थानत्व- मित्येवकाराभिप्रायः। द्रविणशब्देन सर्वस्वप्रायत्वमनेकस्वकृत्योपयोगित्वमुक्तम् । उसी का अनुगमन करते हैं । और वह ( व्यङ्ग्य ) दो 'भी' शब्दों के दो जगहों ( कर्म और क्रिया ) में लगाये जाने से, 'और' शब्द के तीनों स्थानों पर लगाये जाने से, ( श्लोक में ) 'खलु' शब्द के दोनों जगहों ( 'कुशल' शब्द और 'मानव' शब्द के साथ ) लगाये जाने से और 'मानव' शब्द से स्पष्ट होने ही के कारण गुणीभूत है । विवेक की यह दृष्टि निरुपयोगिनी नहीं है यह दिखाते हैं—वाच्य और व्यङ्ग्य के—। तथा अलङ्कारों का—। जहां व्यङ्ग्य नहीं ही है वहां शुद्ध ( अलङ्कारों ) का प्राधान्य है । अन्यथा—। अर्थात् यदि प्रयत्न नहीं करते हैं । 'ही' का अभिप्राय यह है कि जो मैंने व्यङ्ग्य के प्रकार की पहले उत्प्रेक्षा की है उसमें व्यामोह होना असन्दिग्ध ही है । ( लावण्य में ) 'द्रविण' शब्द से सर्वस्वप्रायत्व तथा अपने अनेक कार्यों का उपयोगी होना कहा है । परवाह—।