ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्तानलो दीपितः । एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥ इत्यत्र व्याजस्तुतिरलङ्कार इति व्याख्यायि केनचित्तन्न चतुरस्रम्; यतोऽस्याभिधेयस्यैतदलङ्कारस्वरूपमात्रपर्यवसायित्वे न सुश्लिष्टता । यतो न तावदयं रागिणः कस्यचिद्विकल्पः । तस्य 'एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता' इत्येवंविधोक्त्यनुपपत्तेः । नापि नीरागस्य; विधाता ने लावण्य के धन के व्यय की परवाह न की, महान क्लेश उठाया, स्वच्छन्द भाव से सुखपूर्वक निवास करते हुए लोगों के ( मन में ) चिन्ता की आग लगाई, और इस बेचारी को भी समान प्रिय के न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला ( कुछ समझ में नहीं आता ) विधाता ने उसकी शरीर-रचना करते हुए, मन में क्या लाभ सोच रखा था ? यहां व्याजस्तुति अलङ्कार है यह किसी ने व्याख्यान किया है सो ठीक नहीं है, क्योंकि यह अभिधेय इस अलङ्कार के स्वरूप में पर्यवसित होने में सुसङ्गत नहीं है । क्योंकि यह किसी रागी पुरुष का विकल्प नहीं है, क्योंकि 'इस बेचारी को समान प्रिय न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला' यह उसकी उक्ति उपपन्न नहीं होती । रागरहित लोचनम् गणित इति । चिरेण हि यो व्ययः सम्पद्यते न तु विद्युदिव झटिति तत्रावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारिणोऽपि तु विधेर्न विवेकलेशो- ऽप्युदभूदिति परमस्योपेक्षावत्त्वम् । अत एवाह— क्लेशो महानिति । स्वच्छन्द- स्येति । विशृङ्खलस्येत्यर्थः । एषापीति । यत्स्वयं निर्मीयते तदेव च निहन्यत इति महद्वैशसमपिशब्देन एवकारेण चोक्तम् । कोऽर्थ इति । न स्वात्मनो न जो व्यय देर तक होता रहता है, न कि बिजली की तरह झट से हो जाता है, उसमें परवाह अवश्य होती है । अनन्त काल से निर्माण करने वाले भी विधाता को विवेक का लेश भी न हुआ यह उसकी परम उपेक्षाकारिता है । इसीलिए कहते हैं—महान् क्लेश—। स्वच्छन्द—। अर्थात् शृङ्खलारहित है । इस बेचारी—। जिसे स्वयं बनाता है उसे ही मार डालता है यह बड़ी क्रूरता है यह 'भी' और 'ही' से कहा है । क्या लाभ सोच—। अर्थात् न अपना न संसार का, न निर्मित का