ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 680 में से
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तृतीय उद्योतः ५१९ ध्वन्यालोकः तस्यैवंविधविकल्पपरिहारैकव्यापारत्वात् । न चायं श्लोकः क्वचित्प्रवन्ध इति श्रूयते, येन तत्प्रकरणानुगतार्थतास्य परिकल्प्यते । पुरुष का भी (विकल्प) नहीं है, क्योंकि उसका इस प्रकार के (विकल्पों) का परिहार एकमात्र व्यापार है न कि यह श्लोक कहीं प्रबन्ध में है ऐसा सुना जाता है जिससे इसका उस प्रकरण के अनुगत अर्थ परिकल्पित होगा । इसलिए यह अप्रस्तुत- लोचनम् लोकस्य न निर्मितस्येत्यर्थः । तस्येति । रागिणो हि वराकी हतेति कृपणतालि- ङ्गितममङ्गलोपहतं चानुचितं वचनम् । तुल्यरमणाभावादिति स्वात्मन्यत्यन्त- मनुचितम् । आत्मन्यपि तद्रूपासम्भावनायां रागितायां च पशुप्रायत्वं स्यात् । ननु च रागिणोऽपि कुतश्चित्कारणात्परिगृहीतकतिपयकालव्रतस्य वा राव- णप्रायस्य वा सीतादिविषये दुष्यन्तप्रायस्य वाऽनिर्ज्ञातजातिविशेषे शकुन्तलादौ किमियं स्वसौभाग्याभिमानगर्भा तत्स्तुतिगर्भा चोक्तिर्न भवति । वीतरागस्य वा अनादिकालाभ्यस्तरागवासनावासिततया मध्यस्थत्वेनापि तां वस्तुतस्तथा पश्यतो नेयमुक्तिः न संभाव्या । न हि वीतरागा विपर्यस्तान् भावान् पश्यति । न ह्यस्य वीणाक्व णितं काकरटितकल्पं प्रतिभाति । तस्मात्प्रस्तुतानुसारेणोभय- स्यापीयमुक्तिरुपपद्यते । अप्रस्तुतप्रशंसायामपि ह्यप्रस्तुतः सम्भवन्नेवार्थो वक्तव्यः, न हि तेजसीत्थमप्रस्तुतप्रशंसा सम्भवति—अहो धिक्ते कार्ष्ण्यमिति सा परं प्रस्तुतपरतयेति नात्रासम्भव इत्याशङ्क्याह—न चेति । निस्सामान्येति उसकी—। 'बेचारी को मार डाला' यह कृपणता से आलिङ्गित और अमङ्गल से उपहत वचन रागी पुरुष के अनुचित है । अपने आप के सम्बन्ध में 'समान रमण के प्राप्त न होने से' यह वचन तो अत्यन्त अनुचित है । अपने में भी उसके समान रूप की न सम्भावना में और फिर भी रागिता में पशुप्रायता होगी । सीता आदि के विषय में रावणप्राय की अथवा अविदित जातिविशेष वाली शकुन्तला आदि के विषय में क्या यह किसी कारणवश कुछ काल के लिये व्रत धारण किए हुए रागी पुरुष की भी अपने सौभाग्य के अभिमान से युक्त और उसकी (नायिका की) स्तुति से युक्त उक्ति नहीं हो सकती है ? अथवा अनादिकाल से राग की वासना से वासित होने के कारण मध्यस्थ रूप से भी उस (नायिका) को देखते हुए वीतराग पुरुष की यह उक्ति नहीं सम्भावित है ? वीतराग पुरुष भावों को विपर्यस्तरूप से नहीं देखता, वीणा का क्वणित उसे काकरटित कल्प प्रतीत नहीं होता । इस लिए प्रस्तुत के अनुसार यह उक्ति दोनों की (रागी अथवा वीतराग की) उपपन्न होती है । अप्रस्तुतप्रशंसा में भी अप्रस्तुत अर्थ सम्भव होता हुआ ही कहा जाना चाहिए । (प्रस्तुत) तेज के विषय में अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं हो सकती । 'अहो तेरी कालिमा को धिक्कार है' इस प्रकार वह (अप्रस्तुतप्रशंसा) बल्कि प्रस्तुत में