ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तस्मादप्रस्तुतप्रशंसैयम्। यस्मादनेन वाच्येन गुणीभूतात्मना निस्सा- मान्यगुणावलोपाध्मातस्य निजमहिमोत्कर्षजनितसमत्सरजनज्वरस्य विशेषज्ञमात्मनो न कञ्चिदेवापरं पश्यतः परिदेवितमेतदिति प्रकाश्यते। तथा चायं धर्मकीर्तेः श्लोक इति प्रसिद्धिः। सम्भाव्यते च तस्यैव। यस्मात्— प्रशंसा है। क्योंकि इस गुणीभूतरूप वाक्य से, (अपने) असाधारण गुण के दर्प से भरे, अपनी महिमा के उत्कर्ष से ईर्ष्यालु जनों को ज्वर उत्पन्न करनेवाले, तथा दूसरे किसी विशेषज्ञ को नहीं देखते हुए (किसी विद्वान् का) यह परिदेवित (क्रन्दन) है यह प्रकाशित किया जाता है। जैसा कि ऐसी प्रसिद्धि है कि यह धर्मकीर्ति का श्लोक है। और सम्भावित होता है उन्हींका। क्योंकि— लोचनम् निजमहिमेति विशेषज्ञमिति परिदेवितमित्येतैश्चतुर्भिर्वाक्यखण्डैः क्रमेण पादच- तुष्टयस्य तात्पर्यं व्याख्यातम्। नन्वत्रापि किं प्रमाणमित्याशङ्क्याह—तथा चेति। ननु किमियतेत्याशङ्क्य तदाशयेन निर्विवादतदीयश्लोकार्पितेनास्याशयं संवा- दयति—सम्भाव्यत इति। अवगाहनमध्यवसितमपि न यत्र आस्तां तस्य सम्पा- दनम्। परमं यदर्थतत्त्वं कौस्तुभादिभ्योऽप्युत्तमम्, अलब्धं प्रयत्नपरीक्षितमपि न प्राप्तं सदृशं यस्य तथाभूतं प्रतिग्राहमेकैको ग्राहो जलचरः प्राणी ऐरावतोच्चैः- श्रवोधन्वन्तरिप्रायो यत्र तदलब्धसदृशप्रतिग्राहकम्। एवंविध इति। परिदेवितविषय इत्यर्थः। इयति चार्थे अप्रस्तुतप्रशंसोपमा- लक्षणमलङ्कारद्वयम्। अनन्तरं तु स्वात्मनि विस्मयधामतयाद्भुते विश्रान्तिः। तात्पर्य रखती है इसलिए यहां असम्भव नहीं, यह आशङ्का करके कहते हैं—न कि०—। असाधारण०, अपनी महिमा०, विशेषज्ञ०, परिदेवित इन चार वाक्यखण्डों से क्रम से (श्लोक के) चारो चरणों के तात्पर्य का व्याख्यान किया। यहां भी क्या प्रमाण है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—जैसा कि—। इतने से क्या ? यह आशङ्का करके निर्विवाद उनके (धर्मकीर्ति के) श्लोक से अर्पित उनके आशय से इसके आशय का संवाद करते हैं—सम्भावित होता है—। जिसमें अवगाहन अध्यवसाय का विषय भी नहीं बना है तो उसका सम्पादन दूर रहे। परम जो अर्थतत्त्व कौस्तुभ आदि हैं उससे भी उत्तम, अलब्ध अर्थात् प्रयत्न से परीक्षा करने पर भी नहीं प्राप्त है सदृश जिसका ऐसा प्रतिग्राह अर्थात् एक-एक ग्राह जलचर प्राणी ऐरावत, उच्चैःश्रवा, धन्वन्तरि प्राय हैं जहाँ वह अलब्धसदृश प्रतिग्राहक है। इस प्रकार का०—। अर्थात् परिदेवित का विषय। इतने अर्थ में अप्रस्तुतप्रशंसा और उपमारूप से अलङ्कार हैं। अनन्त अपने आप में (धर्मकीर्ति को) विस्मय का