भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 581

तृतीय उद्योतः ५२१ ध्वन्यालोकः अनध्यवसितावगाहनमनल्पधीशक्तिना- प्यदृष्टपरमार्थतत्त्वमधिकाभियोगैरपि । मतं मम जगत्यलब्धसदृशप्रतिग्राहकं प्रयास्यति पयोनिधेः पय इव स्वदेहे जराम् ॥ इत्यनेनापि श्लोकेनैवंविधोऽभिप्रायः प्रकाशित एव । अप्रस्तुत- प्रशंसायां च यद्वाच्यं तस्य कदाचिद्विवक्षितत्वं, कदाचिदविवक्षितत्वं, कदाचिद्विवक्षिताविवक्षितत्वमिति त्रयी बन्धच्छाया । तत्र विवक्षित- त्वं यथा— जिसका अवगाहन अनल्प धीशक्तिवाले द्वारा भी अध्यवसाय का विषय नहीं हुआ है, अधिक अभियोग (प्रयत्न) करनेवालों द्वारा भी जिसका परमार्थ तत्त्व देखा नहीं गया है, संसार में अपने योग्य प्रतिग्राहक (समझवाला) जिसे प्राप्त नहीं, ऐसा मेरा मत (सिद्धान्त) समुद्र के जल की भांति अपने शरीर में ही जरा को प्राप्त होगा । इस श्लोक से भी इस प्रकार का अभिप्राय प्रकाशित ही है । अप्रस्तुतप्रशंसा में जो वाच्य है वह कभी विवक्षित, कभी अविवक्षित और कभी विवक्षिताविवक्षित होता है यह तीन प्रकार की बन्धच्छाया है । उनमें से विवक्षित, जैसे— लोचनम् परस्य च श्रोतुजनस्यात्यादरास्पदतया प्रयत्नग्राह्यतया चोत्साहजननेनैवंभूतम- त्यन्तोपादेयं सत्कतिपयसमुचितजनानुग्राहकं कृतमिति स्वात्मनि कुशलकारि- तां प्रदर्श नया धर्मवीरस्पर्शनेन वीररसे विश्रान्तिरिति मन्तव्यम् । अन्यथा परि- देवितमात्रेण किं कृतं स्यात् । अपेक्षापूर्वकारित्वमात्मन्यावेदितं चेत्किं ततः स्वार्थपरार्थासम्भवादित्यलं बहुना । ननु यथास्थितस्यार्थस्यासङ्गतौ भवत्वप्रस्तुतप्रशंसा, इह तु सङ्गतिरस्त्ये- वेत्याशङ्क्य सङ्गतावपि भवत्येवैषेति दर्शयितुमुपक्रमते—अप्रस्तुतेति । धाम होने के कारण अद्भुत में विश्रान्ति है । और दूसरे श्रोता जल के अत्यादर का आस्पद होने से और प्रयत्नग्राह्य होने से उत्साह के जनन द्वारा एवंभूत अत्यन्त उपादेय होता हुआ, कतिपय समुचित जनों का अनुग्राहक किया है, इस प्रकार अपने में कुशलकारिता के प्रदर्शन से धर्मवीर के स्पर्श द्वारा वीररस में विश्रान्ति है यह मानना चाहिए । अन्यथा परिदेवितमात्र से क्या लाभ होता । यदि अपने में अपेक्षापूर्वककारित्व का आवेदन किया है तो उस स्वार्थ और परार्थ के असम्भव से क्या ! अलं बहुना ! जब कि यथास्थित अर्थ की सङ्गति न हो तो अप्रस्तुतप्रशंसा हो सकती है, यहां तो सङ्गति ही है, यह आशंका करके 'सङ्गति में भी यही होगी' यह दिखाने के लिए