ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें५२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भृशमक्षेत्रपतितः किमित्क्षोर्दोषोऽसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥ यथा वा ममैव— अमी ये दृश्यन्ते ननु सुभगरूपाः सफलता भवत्येषां यस्य क्षणमुपगतानां विषयताम् । निरालोके लोके कथमिदमहो चक्षुरधुना समं जातं सर्वैर्न सममथवान्यैरवयवैः ॥ अनयोर्हि द्वयोः श्लोकयोरिक्षुचक्षुषी विवक्षितस्वरूपे एव न च दूसरों के लिए जो पीड़ा का अनुभव करता है, भङ्ग होने पर भी जो मधुर बना रहता है, जिसका विकार भी यहां सभी के अभिमत होता है, यदि वह इक्षु खराब क्षेत्र में गिर कर नहीं वृद्धि प्राप्त हुआ तो वह दोष क्या इक्षु का है गुणरहित मरुभूमि का नहीं ? अथवा जैसे मेरा ही— ये जो सुभग रूपोंवाले ( शरीर के अवयव ) दिखाई देते हैं इनकी जिसका क्षण भर विषय हो जाने से सफलता होती है, आश्चर्य है यह चक्षु भी अब अन्धकारमय जगत् में सभी अन्य अवयवों के समान भी नहीं रहा। इन दोनों श्लोकों में इक्षु और चक्षु विवक्षितस्वरूप ही हैं न कि प्रस्तुत हैं। लोचनम् नन्विति। यैरिदं जगद्भूषितमित्यर्थः। यस्य चक्षुषो विषयतां क्षणं गतानामेषां सफलता भवति तदिदं चक्षुरिति सम्बन्धः। आलोको विवेकोऽपि। न सममिति। हस्तो हि परस्पर्शादानादावप्युपयोगी । अवयवैरिति । अतितुच्छप्रायैरित्यर्थः अप्राप्तः पर उत्कृष्टो भागोऽर्थलाभात्मकः स्वरूपप्रथनलक्षणो वा येन तस्य। कथया- मीत्यादिप्रत्युक्तिः । अनेन पदेनेदमाह—अकथनीयमेतत् श्रूयमाणं हि निर्वेदाय उपक्रम करते हैं—अप्रस्तुतप्रशंसा—। सुभग—। अर्थात् जिन्होंने इस जगत् को भूषित कर रखा है । सम्बन्ध यह कि जिस चक्षु की विषयता क्षण भर प्राप्त हुए इनकी सफलता होती है वह यह चक्षु । आलोक विवेक भी । समान भी नहीं—। हाथ दूसरे का स्पर्श ग्रहण करने आदि में भी उपयोगी है। अवयवों—। अर्थात् अतितुच्छप्राय। जिसने पर अर्थात् उत्कृष्ट अर्थलाभरूप अथवा स्वरूपख्यातिरूप भाग प्राप्त नहीं किया है उसका । 'कहता हूँ' इत्यादि प्रत्युक्ति है । इस पद से यह कहा है—यह कहने की बात नहीं,