ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५२३ ध्वन्यालोकः प्रस्तुते । महागुणस्याविषयपतितत्वादप्राप्तपरभागस्य कस्यचित्स्वरूप- मुपवर्णयितुं द्वयोरपि श्लोकयोस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात् । अविवक्षित- त्वं यथा— कस्त्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि, साधु विदितं कस्मादिदं कथ्यते । वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायापि परोपकारकरिणी मार्गस्थितस्यापि मे ॥ क्योंकि महान् गुणवाला, अविषय में पड़े होने के कारण परभाग को प्राप्त न हुआ कोई (व्यक्ति) स्वरूप वर्णन करने के लिए दोनों श्लोकों में तात्पर्य के कारण प्रस्तुत है । अविवक्षित, जैसे— 'हे तुम कौन हो, कहता हूँ, 'मुझे दैव का मारा शाखोटक समझो', जैसे वैराग्य से बोल रहे हो', 'तुमने ठीक समझा', 'यह क्यों' 'यह कहता हूँ?' बाईं ओर यहां वटवृक्ष है, उसे पथिकजन सब प्रकार से सेवन करते हैं, मार्ग पर पड़े भी मेरी छाया भी परोपकार करने वाली नहीं ।' लोचनम् भवति, तथापि तु यदि निर्बन्धस्तत्कथयामि वैराग्यादिति । काक्वा दैवहतकमि- त्यादिना च सूचितं ते वैराग्यमिति यावत् । साधु विदितमित्युत्तरम् । कस्मादिति वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिर्वेदस्मरणोपक्रमं कथंकथमपि निरू- पणीयतयोत्तरम् । वामेनेति । अनुचितेन कुलादिनोपलक्षित इत्यर्थः । वट इति । च्छायामात्रकरणादेव फलदानादिशून्यादुद्धुरकन्धर इत्यर्थः । छायापीति । शाखोटको हि श्मशानाग्निज्वालालीढलतापल्लवादिश्चरुविशेषः । सुनने से निर्वेद होगा, तथापि यदि आग्रह है तो कहता हूँ । वैराग्य से— । काकु से और 'दैव का मारा' इत्यादि से तुम्हारा वैराग्य मालूम हो गया । 'तुमने ठीक समझा' यह उत्तर है । 'क्यों' यह वैराग्य के सम्बन्ध में हेतु प्रश्न है । 'यह कहता हूँ' इत्यादि निर्वेदसहित स्मरण का उपक्रम करते हुए किसी-किसी प्रकार, निरूपणीय होने के कारण उत्तर है । बाईं ओर—। अर्थात् अनुचित कुल आदि से उपलक्षित । वट वृक्ष—। अर्थात् फलदान आदि से रहित केवल छाया करने से ऊपर कंधा किए हुए । छाया भी—। श्मशान की आग की ज्वाला से झुलसे लता-पल्लवों आदि वाला कोई वृक्ष 'शाखोटक' है ।