भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 680 में से

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पृष्ठ 584

५२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न हि वृक्षविशेषेण सहोक्तिप्रत्युक्तो सम्भवत इत्यविवक्षिताभिधे- येनैवानेन श्लोकेन समृद्धासत्पुरुषसमीपवर्तिनो निर्धनस्य कस्यचिन्म- नस्विनः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यार्थीकृतमिति प्रतीयते । विवक्षितत्वाविवक्षितत्वं यथा— उप्पहजाआएँ असोहिणीएँ फलकुसुमपत्तरहिआए वेरीएँ वइं देन्तो पामर हो ओहसिज्जिहसि ॥ अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी न चासम्भवी । तस्माद्वा- च्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्ये यत्नतो निरूपणीये । किसी वृक्ष के साथ बातचीत सम्भव नहीं, इसलिए अविवक्षित अभिधेय वाले ही इस श्लोक से समृद्ध असत्पुरुष के समीप रहनेवाले किसी निर्धन मनस्वी का निर्वेद- वचन तात्पर्य द्वारा वाक्यार्थ किया गया है, यह प्रतीत होता है । विवक्षित-अविवक्षित जैसे— 'हे पामर, कुमार्ग में पैदा हुई, अशोभन, फल और फूल और पत्तोंरहित बदरी को बोता हुआ तू उपहास का पात्र बनेगा ।' यहां वाच्य अर्थ अत्यन्त सम्भवी है और न असम्भवी है । इसलिए वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य का यत्नपूर्वक निरूपण करना चाहिए । लोचनम् अत्राविवक्षायां हेतुमाह—न हीति । समृद्धो योऽसत्पुरुषः । 'समृद्धसत्पुरुष' इति पाठे समृद्धेन ऋद्धिमात्रेण सत्पुरुषो न तु गुणादिनेति व्याख्येयम् । नात्य- न्तमिति । वाच्यभावनियमो नास्तीति न शक्यं वक्तुं, व्यङ्ग्यस्यापि भावादिति तात्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथाकुलोद्भूतायाः । अशोभनाया इति लावण्यरहितायाः । फलकुसुमपत्त्ररहिताया इत्येवम्भूतापि काचित्पुत्रिणी वा भ्रात्रादिपक्षपरिपूर्णतया सम्बन्धिवर्गपोषिता वा परिरक्ष्यते । बदर्या वृत्तिं ददत्पामर भोः, हसिष्यसे सर्वलोकैरिति भावः । एवमप्रस्तुतप्रशंसां प्रसङ्गतो यहां अविवक्षा में हेतु कहते हैं—किसी वृक्ष—। समृद्ध जो असत्पुरुष । 'समृद्ध- सत्पुरुष' इस पाठ में समृद्ध से अर्थात् ऋद्धिमात्र से सत्पुरुष, न कि गुण आदि से, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । अत्यन्त—। तात्पर्य यह कि वाच्य का सम्भव नहीं है यह नहीं कह सकते, क्योंकि व्यङ्ग्य भी सम्भव है । जैसा कि कुमार्ग में पैदा हुई अर्थात् उस प्रकार कुलीन नहीं। अशोभन अर्थात् लावण्यरहित । फल, फूल और पत्तों से रहित, इस प्रकार की भी कोई पुत्रवाली अथवा भाई आदि के भरे होने से अथवा संवन्धि-वर्ग द्वारा पोषित होकर रक्षित होती है । हे पामर, बदरी को बोता हुआ सभी लोगों द्वारा उपहास का पात्र बनेगा, यह भाव है । इस प्रकार अप्रस्तुतप्रशंसा को प्रसङ्गतः निरूपण करके