ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५२५ ध्वन्यालोकः प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थिते काव्ये उभे ततोऽन्यद्यत्तच्चित्रमभिधीयते ॥ ४१ ॥ चित्रं शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम् । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं वाच्यचित्रमतः परम् ॥ ४२ ॥ व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिसंज्ञितकाव्यप्रकारः गुणीभावे तु गुणीभूतव्यङ्ग्यता । ततोऽन्यद्रसभावादितात्पर्यरहितं व्यङ्ग्यार्थविशे- षप्रकाशनशक्तिशून्यं च काव्यं केवलवाच्यवाचकवैचित्र्यमात्राश्रयेणो- पनिबद्धमालेख्यप्रख्यं यदाभासते तच्चित्रम् । न तन्मुख्यं काव्यम् । काव्यानुकारो ह्यसौ । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं यथा दुष्करयमकादि । प्रधानाभाव और गुणभाव के द्वारा इस प्रकार व्यङ्ग्य के व्यवस्थित होने पर काव्य दो प्रकार के हैं, उनसे जो अन्य है वह 'चित्र' कहलाता है ॥ ४१ ॥ शब्द और अर्थ के भेद से चित्र दो प्रकार का होता है, उनमें कुछ शब्दचित्र होता है, उससे दूसरा वाच्यचित्र ॥ ४२ ॥ व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि नाम का काव्य प्रकार होता है, गुणभाव में गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है। उनसे अन्य रस, भाव आदि के तात्पर्य से रहित और व्यङ्ग्य अर्थ की प्रकाशन की शक्ति से शून्य काव्य केवल वाच्य और वाचक के वैचित्र्य- मात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर जो आलेख्य ( चित्र ) की भांति मालूम होता है वह 'चित्र' है । वह मुख्य काव्य नहीं है। वह काव्य का अनुकरण है । उनमें कुछ शब्दचित्र हैं, जैसे दुष्कर यमक आदि । उस शब्दचित्र से अन्य, व्यङ्ग्य अर्थ के संस्पर्श से लोचनम् निरूप्य प्रकृतमेव यन्निरूपणीयं तदुपसंहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसा- यामपि लावण्येत्यत्र श्लोके यस्माद्व्यामोहो लोकस्य दृष्टस्ततो हेतोरित्यर्थः ॥४०॥ एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं तत्र का वार्तेति निरूपयितु- माह—प्रधानेत्यादिना । कारिकाद्वयेन । प्रकृत ही जो निरूपणीय है उसका उपसंहार करते हैं—इस लिए—। अर्थात् अप्रस्तुत- प्रशंसा में भी 'लावण्यद्रविण०' इस श्लोक में जो लोगों का व्यामोह देखा जा चुका है उस कारण ॥ ४० ॥ इस प्रकार व्यङ्ग्य का स्वरूप-निरूपण करके जो सर्वथा उस (व्यङ्ग्य) से शून्य है उसकी बात क्या, यह निरूपण करने के लिए कहते हैं—प्रधान—। इत्यादि दो