भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 680 में से

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पृष्ठ 586

५२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यचित्रं ततः शब्दचित्रादन्यद्व्यङ्ग्यार्थसंस्पर्शरहितं प्राधान्येन वाक्यार्थतया स्थितं रसादितात्पर्यरहितमुत्प्रेक्षादि । अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शः । प्रती- यमानो ह्यर्थस्त्रिभेदः प्राक्प्रदर्शितः । तत्र यत्र वस्त्वलङ्कारान्तरं वा व्यङ्ग्यं नास्ति स नाम चित्रस्य कल्प्यतां विषयः । यत्र तु रसादीना- मविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भवत्येव । यस्मादवस्तुसंस्पर्शिता काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वमेव जगद्गतमवश्यं कस्यचिद्र- सस्य भावस्य वाऽङ्गत्वं प्रतिपद्यते अन्ततो विभावत्वेन । चित्तवृत्तिवि- शेषा हि रसादयः, न च तदस्ति वस्तु किञ्चिद्यन्न चित्तवृत्तिविशेष- रहित, प्राधान्य अर्थात् वाक्यार्थरूप से स्थित, एवं रस आदि के तात्पर्य से रहित उत्प्रेक्षा आदि वाच्यचित्र हैं। 'यह 'चित्र' क्या है ? जहां प्रतीयमान अर्थ का संस्पर्श न हो । प्रतीयमान अर्थ तीन प्रकार का पहले प्रदर्शित हो चुका है। वहां जहां वस्तु अथवा अलङ्कारान्तर व्यङ्ग्य नहीं है वह चित्र का विषय समझ लीजिए । परन्तु जहां रसादि का विषयत्व नहीं वह काव्य का प्रकार हो सकता ही नहीं । क्योंकि काव्य में वस्तुसंस्पर्श का अभाव नहीं बन सकता और संसार की सभी वस्तुएँ अवश्य किसी रस का अथवा भाव की अङ्ग बन जाती है, अन्ततः विभावरूप से । रसादि चित्तवृत्ति विशेष हैं। वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो चित्तवृत्तिविशेष को उत्पन्न नहीं करती, यदि वह उसे लोचनम् शब्दचित्रमिति । यमकचक्रबन्धादिचित्रतया प्रसिद्धमेव तत्तुल्यमेवार्थचित्रं मन्त- व्यमिति भावः। आलेख्यप्रख्यमिति। रसादिजीवरहितं मुख्यप्रतिकृतिरूपं चेत्यर्थः। अथ किमिदमिति । आक्षेपे वक्ष्यमाण आशयः । अत्रोत्तरम्—यत्र नेति । आक्षेप्ता स्वाभिप्रायं दर्शयति—प्रतीयमान इति । अवस्तुसंस्पर्शितेति । कचटत- पादिवन्निरर्थकत्वं दशदाडिमादिवदसंबद्धार्थत्वं वेत्यर्थः । कारिकाओं से । शब्दचित्र—। भाव यह कि यमक, चित्रबन्ध आदि चित्ररूप से प्रसिद्ध ही हैं, उनके तुल्य ही अर्थचित्र को समझना चाहिए। आलेख्य की भांति—। अर्थात् रसादिरूप जीव से रहित और मुख्य अनुकरणरूप । यह चित्र—। आक्षेप में वक्ष्यमाण आशय है । यहां उत्तर है—जहां प्रतीय- मान—। आक्षेप करनेवाला अपना अभिप्राय दिखाता है—प्रतीयमान—। वस्तु संस्पर्श का अभाव—। अर्थात् क च ट त प आदि की भांति निरर्थक होगा अथवा दशदाडिम आदि की भांति असम्बद्धार्थ होगा ।