ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५२७ ध्वन्यालोकः मुपजनयति तदनुत्पादने वा कविविषयतैव तस्य न स्यात् कविविष- यश्च चित्रतया कश्चिन्निरूप्यते । अत्रोच्यते—सत्यं न तादृक्काव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनाम- प्रतीतिः । किं तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्यः कविः शब्दालङ्कार- मर्थालङ्कारं वोपनिबध्नाति तदा तद्विवक्षापेक्षया रसादिशून्यतार्थस्य उत्पन्न न करे तो वह कवि का विषय ही नहीं होगी और कुछ कवि का विषय चित्र- रूप से निरूपण किया जाता है । यहां कहते हैं—ठीक है, वह काव्य का कोई प्रकार नहीं है जहां रसादि की प्रतीति न हो । किन्तु जब रस, भाव आदि की विवक्षा से रहित कवि शब्दालङ्कार अथवा अर्थालङ्कार का उपनिबन्धन करता है तब उसकी विवक्षा की अपेक्षा अर्थ रसादि- लोचनम् ननु मा भूत्कविविषय इत्याशङ्क्याह—कविविषयश्चेति । काव्यरूपतया यद्यपि न निर्दिष्टस्तथापि कविगोचरीकृत एवासौ वक्तव्यः अन्यस्य वासुकि- वृत्तान्ततुल्यस्येहाभिधानायोगात् कवेश्चेद्गोचरो नूनममुना प्रीतिर्जनयितव्या सा चावश्यं विभावानुभावव्यभिचारिपर्यवसायिनीति भावः । किं त्विति । विवक्षा तत्परत्वेन नाङ्गत्वेन कथंचन । इत्यादियोऽलंकारनिवेशने समीक्षाप्रकार उक्तस्तं यदा नानुसरतीत्यर्थः । रसादिशून्येति । नैव तत्र रसप्रतीतिरस्ति यथा पाकानभिज्ञसूदविरचिते मांस- पाकविशेषे । ननु वस्तुसौन्दर्यादवश्यं भवति कदाचित्तास्वादोऽकुशलकृता- कवि का विषय मत हो (तो क्या हानि है !) यह आशंका करके कहते हैं— और कवि का विषय—। भाव यह कि काव्यरूप से यद्यपि निर्दिष्ट नहीं है तथापि उसे कवि द्वारा गोचरीकृत ही कहना चाहिए क्योंकि वासुकि के वृत्तान्त के सदृश अन्य का यहाँ अभिधान नहीं है, यदि कवि का गोचर है तो निश्चय ही इसे प्रीति उत्पन्न करनी चाहिए, और वह (प्रीति) अवश्य ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी में पर्यवसित होती है । किन्तु—। अर्थात् 'तत्पररूप से विवक्षा होनी चाहिए, अङ्गीरूप से नहीं होनी चाहिए' इत्यादि जो अलङ्कार के निवेशन में समीक्षा का प्रकार कहा है जब उसे अनुसरण नहीं करता है । रसादिशून्यता—। वहाँ रस की प्रतीति नहीं ही है, जैसे पाकक्रिया को न जानने वाले रसोइया के बनाये हुए किसी मांस के पाक में । वस्तु के सौन्दर्य से भी उस प्रकार का आस्वाद कदाचित् हो सकता है जैसे अकुशल व्यक्ति द्वारा (दही आदि को मिलाकर बनाई