ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः परिकल्प्यते । विवक्षोपारूढ एव हि काव्ये शब्दानामर्थः । वाच्यसाम- र्ध्यवशेन च कविविवक्षाविरहेऽपि तथाविधे विषये रसादिप्रतीतिर्भवन्ती परिदुर्बला भवतीत्यनेनापि प्रकारेण नीरसत्वं परिकल्प्य चित्रविषयो व्यवस्थाप्यते । तदिदमुक्तम्— 'रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ रसादिषु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवती यदा । तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेर्यत्र न गोचरः ॥' शून्यता मानी जाती है । क्योंकि काव्य में शब्दों का अर्थ (कवि की) विवक्षा के उपारूढ ही होता है । और वाच्य की सामर्थ्य के वश कवि की विवक्षा के न होने पर भी उस प्रकार के विषय में रसादि की प्रतीति होती हुई बहुत दुर्बल होती है, इस प्रकार से भी नीरसत्व को मान कर चित्र का विषय व्यवस्थित करते हैं । इसलिए यह कहा है— 'रस, भाव आदि के विषय की विवक्षा न होने पर जो अलङ्कार का निबन्ध है वह 'चित्र' का विषय माना गया है । परन्तु जब रसादि में तात्पर्य रखनेवाली विवक्षा हो तब वह काव्य नहीं है जहाँ ध्वनि का गोचर न हो । लोचनम् यामपि शिखरिण्यामिवेत्याशङ्क्याह—वाच्येत्यादि । अनेनापीति । पूर्वं सर्वथा तच्छून्यत्वमुक्तमधुना तु दौर्बल्यमित्यपिशब्दस्यार्थः । अज्ञकृतायां च शिखरि- ण्यामहो शिखरिणीति न तज्ज्ञानाच्चमत्कारः अपि तु दधिगुडमरिचं चैतदसम- ञ्जसयोजितमिति वक्तारो भवन्ति । उक्तमिति । मयैवेत्यर्थः । अलङ्काराणां शब्दार्थगतानां निबन्ध इत्यर्थः । ननु 'तच्चित्रमभिधीयते' हुई) शिखरिणी में, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य की सामर्थ्य के वश—। इस प्रकार से भी—। पहले तो उस (रसादि) का सर्वथा शून्यत्व कहा है परन्तु अब दौर्बल्य को (कहते हैं) यह 'भी' शब्द का अर्थ है । बेवकूफ द्वारा रचित शिखरिणी में 'कमाल की शिखरिणी है' यह चमत्कार उसके ज्ञान से नहीं होता बल्कि 'यह दही, गुड़ और और मरिच को बेकायदे डालकर बनाया गया है' यह कहने वाले हो जाते हैं । कहा है—। अर्थात् मैंने ही । अर्थात् शब्दगत और अर्थगत अलङ्कारों का निबन्ध । तो उस चित्र का अभिधान