ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ५२९ ध्वन्यालोकः एतच्च चित्रं कवीनां विश्रृङ्खलगिरां रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्य- प्रवृत्तिदर्शनादस्माभिः परिकल्पितम् । इदानीन्तनानां तु न्याय्ये काव्यनयव्यवस्थापने क्रियमाणे नास्त्येव ध्वनिव्यतिरिक्तः काव्य- प्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीनां रसादितात्पर्यविरहे व्यापार एव न शोभते । रसादितात्पर्ये च नास्त्येव तद्वस्तु यदभिमतरसाङ्गतां नीयमानं न प्रगुणीभवति । अचेतना अपि हि भावा यथायथमुचित- रसविभावतया चेतनवृत्तान्तयोजनया वा न सन्त्येव ते ये यान्ति न रसाङ्गताम् । तथा चेदमुच्यते— और निरङ्कुश वाणी वाले कवियों की रसादि के तात्पर्य की अपेक्षा न करके ही प्रवृत्ति देखी जाने से हमने इस 'चित्र' की परिकल्पना की है । परन्तु न्यायानुकूल काव्यमार्ग का व्यवस्थापन हो जाने पर अब के कवियों के लिए ध्वनि से व्यतिरिक्त काव्य का प्रकार नहीं ही है । क्योंकि परिपाक वाले कवियों का रसादि के तात्पर्य के अभाव में व्यापार ही नहीं शोभा देता । और रसादि के तात्पर्य में वह वस्तु नहीं ही है जो अभिमत रस का अंग होती हुई प्रगुण न हो जाती हो । अचेतन भी वे भाव यथानुकूल उचित रस के विभाव के रूप में अथवा चेतन वृत्तान्त की योजना से नहीं ही हैं जो रस का अङ्ग नहीं बन जाते हैं । जैसा कि यह कहते हैं— लोचनम् इति किमनेनोपदिष्टेन । अकाव्यरूपं हि तदिति कथितम् । हेयतया तदुपदि- श्यत इति चेत्—घटे कृते कविर्न भवतीत्येतदपि वक्तव्यमित्याशङ्क्य कविभिः खलु तत्कृतमतो हेयतयोपदिश्यत इत्येतन्निरूपयति—एतच्चेत्यादिना । परिपाक- वतामिति । शब्दार्थविषयो रसौचित्यलक्षणः परिपाको विद्यते येषाम् । यत्पदानि त्यजन्त्येव परिवृत्तिसहिष्णुताम् । करते हैं' इस उपदेश से क्या लाभ ? क्योंकि उसे अकाव्यरूप कह चुके हैं । यदि कहें कि 'हेय रूप होने से उसका उपदेश करते हैं तो 'घट निर्माण करने पर कवि नहीं होता है' यह भी कहना चाहिए, यह आशङ्का करके यह निरूपण करते हैं कि कवियों ने उसे किया है इसलिए हेयरूप से उसका निरूपण करते हैं—और निरङ्कुश—। परिपाक वाले—। शब्द और अर्थ का रसौचित्यरूप परिपाक है जिनका । 'जो कि पद परिवर्तन का सहन नहीं ही करते ( उसे शब्दन्यास में निष्णात लोग शब्दपाक कहते हैं )' । ३४ ध्व०