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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

५१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सङ्कीर्णो हि कश्चिद्‌ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च लक्ष्ये दृश्यते मार्गः। तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन व्यपदेशः कर्तव्यः। न सर्वत्र ध्वनिरागिणा भवितव्यम्। यथा— पत्युः शिरश्चन्द्रकलामेनने स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम्। सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान॥ यथा च— प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता। लक्ष्य में कुछ मार्ग ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का सङ्कीर्ण देखा जाता है। वहां जिसके साथ युक्ति हो वहां उससे व्यपदेश करना चाहिए। सर्वत्र ध्वनि का पक्षपाती नहीं होना चाहिए। जैसे— 'पति के सिर की चन्द्रकला को इससे स्पर्श करना' (यह कह कर) सखी द्वारा परिहासपूर्वक चरणों को रंग कर असीसी गई उस (पार्वती) ने बिना कुछ कहे माल्य से उस (सखी) को मारा। और जैसे— ऊँचे से फूल देते हुए प्रियतम से विपक्ष (सौत) का नाम लिए जाने पर मानिनी लोचनम् रेवात्र युक्तिः। पत्युरिति। अनेनेति। अलक्तकोपरक्तस्य हि चन्द्रमसः परभाग- लाभोऽनवरतपादपतनप्रसादनैर्विना न पत्युर्झटिति यथेष्टानुवर्तिन्या भाव्य- मिति चोपदेशः। शिरोधृता या चन्द्रकला तामपि परिभवेति सपत्नीलोकाप- जय उक्तः। निर्वचनमिति। अनेन लज्जावहित्थहर्षेर्ष्यासाध्वससौभाग्याभिमानप्रभृति य- द्यपि ध्वन्यते, तथापि तन्निर्वचनशब्दार्थस्य कुमारीजनोचितस्याप्रतिपत्तिलक्षण- स्यार्थस्योपकारकत्वं केवलमाचरति। उपस्कृतस्त्वर्थः शृङ्गाराङ्गतामेतीति। प्रयच्छतेति। उच्चैरिति। उच्चैर्यानि कुसुमानि कान्तया स्वयं ग्रहीतुमश- चारुत्वप्रतीति ही युक्ति है। पति के—। इससे—। आलते से रंगे हुए चन्द्रमा को दूसरे (चरण) के भाग (अंश) का लाभ करना अर्थात् निरन्तर पैरों पर गिर कर प्रसादन के बिना झट से पति की इच्छा के अनुकूल मत चलना, यह उपदेश है। सिर पर रखी हुई जो चन्द्रकला है उसे भी परिभूत करो, इस प्रकार सपत्नी जन का पराजय कहा है। बिना कुछ कहें—। इससे यद्यपि लज्जा, अवहित्य, हर्ष, ईर्ष्या, साध्वस, सौभाग्याभिमान ध्वनित होते हैं तथापि वे कुमारी जन के उचित 'बिना कुछ कहे' शब्द के अर्थ अप्रतिपत्तिरूप अर्थ के उपकारक हो जाते हैं। और उपस्कृत अर्थ शृङ्गार का अङ्ग बन जाता है। ऊँचे से—। अर्थात् जो फूल ऊंची डाल पर थे प्रियतमा ने स्वयं ग्रहण करने में

तृतीय उद्योतः ५१३ ध्वन्यालोकः न किञ्चिदूचे चरणेन केवलं लिलेख बाष्पाकुललोचना भुवम् ॥ इत्यत्र ‘निर्वचनं जघान’ ‘न किञ्चिदूचे’ इति प्रतिषेधमुखेन व्य- ङ्ग्यस्यार्थस्योक्त्या किञ्चिद्विषयीकृतत्वाद् गुणीभाव एव शोभते । यदा वक्रोक्तिं विना व्यङ्ग्योऽर्थस्तात्पर्येण प्रतीयते तदा तस्य प्राधान्यम् । यथा ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ इत्यादौ । इह पुनरुक्तिर्भङ्ग्यास्तीति वाच्य- स्यापि प्राधान्यम् । तस्मान्नात्रानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यपदेशो विधेयः । ने कुछ नहीं कहा, केवल वाष्प से आकुल आँखों वाली चरण से जमीन कुरेदने लगी । यहां ‘बिना कुछ कहे मारा’ ‘कुछ नहीं बोली’ इस प्रतिषेध के द्वारा व्यङ्ग्य अर्थ का उक्ति द्वारा कुछ विषय कर दिए जाने के कारण गुणीभाव ही शोभता है । जब वक्रोक्ति के बिना व्यङ्ग्य अर्थ तात्पर्य से प्रतीत होता है तब उसका प्राधान्य है । जैसे ‘एवं वादिनि देवर्षों’ इत्यादि में । यहां भङ्गी से उक्ति है इसलिए वाच्य का भी प्राधान्य है । इसलिए यहाँ अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का व्यपदेश नहीं करना चाहिए । लोचनम् क्यत्वाद्याचिनानीत्यर्थः । अस्मदुपाध्यायास्तु हृद्यतमानि पुष्पाणि अमुके, गृहाण गृहाणेत्युच्चैस्तारस्वरेणादरातिशयार्थं प्रयच्छता । अत एव लम्भितेति । न किंचिदिति । एवं विधेषु शृङ्गारावसरेषु तामेवायं स्मरतीति मानप्रदर्शनमेवात्र न युक्तमिति सातिशयमन्युसंभारो व्यङ्ग्यो वचननिषेधस्यैव वाच्यस्य संस्कारः । तद्वक्ष्यति-उक्तिर्भङ्ग्यास्तीति । तस्येति व्यङ्ग्यस्य । इहेति पत्युरि- त्यादौ । वाच्यस्यापीति । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । प्राधान्यमपि भवति वाच्यस्य, रसाद्यपेक्षया तु गुणतापीत्यर्थः । अत एवोपसंहारे ध्वनिशब्दस्य विशेषण- मुक्तम् ॥ ३६ ॥ असमर्थ होकर याचना की । परन्तु हमारे उपाध्याय ( कहते हैं कि ) अरी अमुके ! इन अच्छे फूलों को ले, ले’ इस प्रकार ऊंचे तारस्वर से अतिशय आदर के लिए देते हुए । अतएव ‘लम्भिता’ । ‘कुछ नहीं’ । इस प्रकार के शृङ्गार के अवसरों में उसे ही यह स्मरण करता है, इसलिए यहां मानप्रदर्शन ही ठीक नहीं, इस व्यङ्ग्य सातिशय मन्युभार वचननिषेधरूप वाच्य का ही संस्कार ( क ) है । उसे कहेंगे—उक्ति भङ्गी से है— । उसका अर्थात् व्यङ्ग्य का । यहां ‘पत्युः’ इत्यादि में । वाच्य का भी—। ‘भी’ शब्द भिन्नक्रम है । अर्थात् वाच्य का प्राधान्य भी होता है, किन्तु रसादि की अपेक्षा से गुणता भी होती है । अतएव उपसंहार में ध्वनि शब्द का विशेषण (अनुरणनरूपव्यङ्ग्य) कहा है ॥ ३९ ॥ ३३ ध्व०

५१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । धत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि काव्यप्रकारो रसभावादितात्पर्यालोचने पुनर्ध्वनिरेव सम्पद्यते । यथात्रैवानन्तरोदाहृते श्लोकद्वये । यथा च— दुराराधा राधा सुभग यदनेनापि मृजत- यह गुणीभूतव्यङ्ग्य भी प्रकार रसादि के तात्पर्य के पर्यालोचन से पुनः ध्वनि- रूप हो जाता है ॥ ४० ॥ गुणीभूतव्यङ्ग्य भी काव्य का प्रकार रसभावादि के तात्पर्य के पर्यालोचन करने पर पुनः ध्वनि ही बन जाता है । जैसे यहीं अभी उदाहृत दोनों श्लोकों में । और जैसे— 'हे सुभग, जो कि प्राणेश्वरी के इस जघन ( सुरतकालीन ) वस्त्र से भी गिरे लोचनम् एतदेव निर्वाहयन् काव्यात्मत्वं ध्वनेरेव परिदीपयति-प्रकार इति । श्लोकद्वय इति तुल्यच्छायं यदुदाहृतं पत्युरित्यादि तत्रेति द्वयशब्दादेवंवादिनोत्यस्यानव- काशः । दुराराधेति । अकारणकुपिता पादपतिते मयि न प्रसीदसि अहो दुराराधासि मा रोदीरित्युक्तिपूर्वं प्रियतमेऽश्रूणि मार्जयति इयमस्या अभ्युपग- मगर्भोक्तिः । सुभगेति । प्रियया यः स्वसंभोगभूषणविहीनः क्षणमपि मोक्तुं न पार्यसे । अनेनापीति । पश्येदं प्रत्यक्षेणेत्यर्थः । तदेव च यदेवमादृतं यत् लज्जा- दित्यागेनाप्येवं धार्यते । मृजत इत्यनेन हि प्रत्युत स्रोतस्सहस्रवाही बाष्पो भवति । इयञ्च त्वं हतचेतनो यन्मां विस्मृत्य तामेव कुपितां मन्यसे । अन्यथा इसे ही निर्वाह करते हुए ( कारिकाकार ) ध्वनि को ही काव्य का आत्मा प्रकाशित करते हैं—यह गुणीभूत—। दोनों श्लोकों में—। समान छायावाला जो उदाहृत है 'पत्युः'० इत्यादि, तहां, । 'दो' शब्द 'एवं वादिनि' इस श्लोक का अवसर नहीं । हे सुभग—। बिना कारण के कुपित तू पैरों पर गिरने पर भी मुझ पर प्रसन्न नहीं होती, हन्त दुराराधा अर्थात् प्रसन्न होने वाली नहीं है, मत रो' यह कह कर प्रियतम जब आंसू पोछने लगे तब उसकी यह अभ्युपगमगर्भ उक्ति है । सुभग—। अपने सम्भोग के भूषणों से विहीन जो तुम प्रियतमा द्वारा क्षणभर भी छोड़े नहीं जाते । इस··· से भी—। अर्थात् इसे प्रत्यक्ष देख लो । जो कि उसे जिसे आदरपूर्वक लज्जा आदि का त्याग करके भी धारण कर रहे हो। पोंछने से—। इससे बल्कि बाष्प हजारों स्रोतों में बहता है । इतना भी तुम्हें होश नहीं कि जो मुझे छोड़ कर उस

तृतीय उद्योतः ५१५ ध्वन्यालोकः स्तवैतत्प्राणेशाजघनवसनेनाश्रु पतितम् । कठोरं स्त्रीचेतस्तदलमुपचारैर्विरम हे क्रियात्कल्याणं वो हरिरनुनयष्वेवमुदितः ॥ हुए आँसू को तुम्हारे पोंछने से राधा प्रसन्न होने वाली नहीं है । स्त्री का चित्त कठोर होता है, उपचार व्यर्थ हैं, बस करो' इस प्रकार अनुनय के ( अवसरों में राधा द्वारा ) कहे गये कृष्ण आप लोगों का कल्याण करें । लोचनम् कथमेवं कुर्याः । पतितमिति । गत इदानीं रोदनावकाशोऽपीत्यर्थः । यदि तूच्यते इयताप्यादरेण किमिति कोपं न मुञ्चसि, तत्किं क्रियते कठोरस्वभावं स्त्रीचेतः । स्त्रीति हि प्रेमाप्रयोगाद्वस्तुविशेषमात्रमेतत्; तस्य चैष स्वभावः, आत्मनि चैतत्सुकुमारहृदया योषित इति न किञ्चिद्वज्रसाराधिकमासां हृदयं यदेवंविध- वृत्तान्तसाक्षात्कारेऽपि सहस्रधा न दलति । उपचारैरिति । दाक्षिण्यप्रयुक्तैः । अनुनयेष्विति बहुवचनेन वारं वारमस्य बहुवल्लभस्येयमेव स्थितिरिति सौभाग्यातिशय उक्तः । एवमेष व्यङ्ग्यार्थसारो वाच्यं भूषयति । तत्त वाच्यं भूषितं सद्दीर्ष्याविप्रलम्भाङ्गत्वमेतीति । यस्तु त्रिष्वपि श्लोकेषु प्रतीयमानस्यैव रसाङ्गत्वं व्याचष्टे स्म । स देवं विक्रीय तद्यात्रोत्सवमकार्षीत् । एवं हि व्यङ्ग्य- स्य या गुणीभूतता प्रकृता सैव समूलं त्रुट्येत् । रसाद्यतिरिक्तस्य हि व्यङ्ग्य- स्य रसाङ्गभावयोगित्वमेव प्राधान्यं नान्यत्किञ्चिदित्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन । कुपिता को ही मानते हो, अन्यथा ऐसा तुम क्यों करते ! गिरे हुए—। अर्थात् अब तो रोने का समय भी नहीं रहा । यदि कहते हो कि इतने आदर से भी कोप का त्याग क्यों नहीं करती तो क्या करूं स्त्री का चित्त कठोर स्वभाव का होता है । स्त्री यह प्रेम का योग न होने से वस्तुमात्र है, और उस ( वस्तुमात्र ) का यह स्वभाव । अपने में ( यह सोचना ) कुछ नहीं कि स्त्रियां सुकुमार हृदय की होती हैं, इनका हृदय वज्रसार से भी अधिक ( कठोर ) होता है क्योंकि इस प्रकार के वृत्तान्त का साक्षात्कार होने पर भी हजार टुकड़े नहीं हो जाता । उपचार दाक्षिण्यप्रयुक्त । अनुनय के अवसरों में इस बहुवचन से इस बहुवल्लभ की वार-बार की यही स्थिति है, यह अतिशय सौभाग्य कहा है । इस प्रकार यह व्यङ्ग्यार्थ का सार वाच्य को अलङ्कृत करता है । वह वाच्य भूषित होकर ईर्ष्याविप्रलम्भ का अङ्ग हो जाता है । जिसने कि 'तीनों श्लोकों में प्रतीयमान ही रस का अङ्ग है' यह व्याख्यान किया है उसने देवता को बेच कर उनकी यात्रा का उत्सव मनाया है । क्योंकि इस प्रकार ( व्याख्यान करने पर ) जो व्यङ्ग्य की गुणीभूतता प्रकृत है वही समूल टूट जायगी । रसादि से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य का रस का अङ्गभाव प्राप्त करना ही प्राधान्य है, दूसरा कुछ नहीं । पूर्वजों के साथ विवाद व्यर्थ है !

५१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

एवं स्थिते च 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादिश्लोकनिर्दिष्टानां पदानां व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतिपादनेऽप्येतद्वाक्यार्थीभूतरसापेक्षया व्यञ्जकत्वमुक्तम् । न तेषां पदानामर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिभ्रमो विधातव्यः, विवक्षितवाच्यत्वात्तेषाम् । तेषु हि व्यङ्ग्यविशिष्टत्वं वाच्यस्य प्रतीयते न तु व्यङ्ग्यरूपपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनिः, पदानि तु गुणीभूतव्यङ्ग्यानि । न च केवलं गुणीभूतव्यङ्ग्या- न्येव पदान्यलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनेर्व्यञ्जकानि यावदर्थान्तरसंक्रमित- वाच्यानि ध्वनिप्रभेदरूपाण्यपि । यथात्रैव श्लोके रावण इत्यस्य प्रभेदा- न्तररूपव्यञ्जकत्वम् । यत्र तु वाक्ये रसादितात्पर्यं नास्ति गुणीभूत- व्यङ्ग्यैः पदैरूल्लासितेऽपि तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव समुदायधर्मः ।

इस प्रकार स्थित होने पर 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकों में निर्दिष्ट पदों का व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य के प्रतिपादन में इसके वाक्यार्थीभूत रस की अपेक्षा से व्यञ्ज- कत्व कहा है। उन पदों में अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यध्वनि का भ्रम नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे विवक्षितवाच्य होते हैं। उनमें वाच्य का व्यङ्ग्यविशिष्टत्व प्रतीत होता है न कि व्यङ्ग्यरूप में परिणतत्व (प्रतीत होता है)। इसलिए वाक्य वहां ध्वनिरूप है और पद गुणीभूतव्यङ्ग्य हैं। केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य ही पद अलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्य ध्वनि के व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि ध्वनि के भेदरूप अर्थान्तरसङ्क्रमित- वाच्य भी। जैसे इसी श्लोक में 'रावण' इस पद का प्रभेदान्तररूप का व्यञ्जकत्व है। परन्तु जिस वाक्य में रसादि में तात्पर्य नहीं है, गुणीभूतव्यङ्ग्य पदों से उल्लसित भी उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही समुदाय का धर्म है।

लोचनम्

एवं स्थित इति। अनन्तरोक्तेन प्रकारेण ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोर्विभागे स्थिते सतीत्यर्थः। कारिकागतमपिशब्दं व्याख्यातुमाह-न चेति। एष च श्लोकः पूर्वमेव व्याख्यात इति न पुनर्लिख्यते। यत्र त्विति। यद्यपि चात्र विषयनिर्वेदात्मकशान्तरसप्रतीतिरस्ति, तथापि चमत्कारोऽयं वाच्यनिष्ठ एव।

इस प्रकार स्थित—। अर्थात् अनन्तरोक्त प्रकार से ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का विभाग स्थित होने पर। कारिकागत 'भी' शब्द का व्याख्यान करने के लिए कहते हैं— केवल—। यह श्लोक पहले ही व्याख्यात हो चुका है, इसलिए फिर नहीं लिखते हैं। जिस वाक्य में—। यद्यपि यहां विषय के प्रति निर्वेदरूप शान्तरस की प्रतीति होती है तथापि यह चमत्कार वाक्य में ही है। असम्भाव्यत्व, विपरीतकारित्वादि व्यङ्ग्य

तृतीय उद्योतः ५१७ ध्वन्यालोकः यथा— राजानमपि सेवन्ते विषममप्युपयुञ्जते । रमन्ते च सह स्त्रीभिः कुशलाः खलु मानवाः ॥ इत्यादौ । वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्यविवेके परः प्रयत्नो विधातव्यः, येन ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोरलङ्काराणां चासङ्कीर्णो विषयः सुज्ञातो भवति । अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्कारविषय एव व्यामोहः प्रव- र्त्तते । यथा— जैसे—राजाओं की भी सेवा करते हैं, विष का भी भक्षण करते हैं और स्त्रियों के साथ भी रमण करते हैं, मानव बड़े कुशल होते हैं। इत्यादि में । वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य के विवेक में अधिक प्रयत्न करना चाहिए, जिससे ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का तथा अलङ्कारों का असङ्कीर्ण विषय सुविदित होता है । अन्यथा अलङ्कार के प्रसिद्ध विषय में ही व्यामोह हो जाता है। जैसे— लोचनम् व्यङ्ग्यं त्वसम्भाव्यत्वविपरीतकारित्वादि तस्यैवानुयायि, तच्चापिशब्दाभ्यामु- भयतो योजिताभ्यां चशब्देन स्थानत्रययोजितेन खलुशब्देन चोभयतो योजि- तेन मानवशब्देन स्पष्टमेवेति गुणीभूतम् । विवेकदर्शना चेयं न निरुपयोगिनीति दर्शयति—वाच्यव्यङ्ग्ययोरिति । अलङ्काराणां चेति । यत्र व्यङ्ग्यं नास्त्येव तत्र तेषां शुद्धानां प्राधान्यम् । अन्यथा त्विति । यदि प्रयत्नवता न भूयत इत्यर्थः । व्यङ्ग्यप्रकारस्तु यो मया पूर्वमुत्प्रेक्षितस्तस्यासंदिग्धमेव व्यामोहस्थानत्व- मित्येवकाराभिप्रायः। द्रविणशब्देन सर्वस्वप्रायत्वमनेकस्वकृत्योपयोगित्वमुक्तम् । उसी का अनुगमन करते हैं । और वह ( व्यङ्ग्य ) दो 'भी' शब्दों के दो जगहों ( कर्म और क्रिया ) में लगाये जाने से, 'और' शब्द के तीनों स्थानों पर लगाये जाने से, ( श्लोक में ) 'खलु' शब्द के दोनों जगहों ( 'कुशल' शब्द और 'मानव' शब्द के साथ ) लगाये जाने से और 'मानव' शब्द से स्पष्ट होने ही के कारण गुणीभूत है । विवेक की यह दृष्टि निरुपयोगिनी नहीं है यह दिखाते हैं—वाच्य और व्यङ्ग्य के—। तथा अलङ्कारों का—। जहां व्यङ्ग्य नहीं ही है वहां शुद्ध ( अलङ्कारों ) का प्राधान्य है । अन्यथा—। अर्थात् यदि प्रयत्न नहीं करते हैं । 'ही' का अभिप्राय यह है कि जो मैंने व्यङ्ग्य के प्रकार की पहले उत्प्रेक्षा की है उसमें व्यामोह होना असन्दिग्ध ही है । ( लावण्य में ) 'द्रविण' शब्द से सर्वस्वप्रायत्व तथा अपने अनेक कार्यों का उपयोगी होना कहा है । परवाह—।

५१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्तानलो दीपितः । एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥ इत्यत्र व्याजस्तुतिरलङ्कार इति व्याख्यायि केनचित्तन्न चतुरस्रम्; यतोऽस्याभिधेयस्यैतदलङ्कारस्वरूपमात्रपर्यवसायित्वे न सुश्लिष्टता । यतो न तावदयं रागिणः कस्यचिद्विकल्पः । तस्य 'एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता' इत्येवंविधोक्त्यनुपपत्तेः । नापि नीरागस्य; विधाता ने लावण्य के धन के व्यय की परवाह न की, महान क्लेश उठाया, स्वच्छन्द भाव से सुखपूर्वक निवास करते हुए लोगों के ( मन में ) चिन्ता की आग लगाई, और इस बेचारी को भी समान प्रिय के न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला ( कुछ समझ में नहीं आता ) विधाता ने उसकी शरीर-रचना करते हुए, मन में क्या लाभ सोच रखा था ? यहां व्याजस्तुति अलङ्कार है यह किसी ने व्याख्यान किया है सो ठीक नहीं है, क्योंकि यह अभिधेय इस अलङ्कार के स्वरूप में पर्यवसित होने में सुसङ्गत नहीं है । क्योंकि यह किसी रागी पुरुष का विकल्प नहीं है, क्योंकि 'इस बेचारी को समान प्रिय न प्राप्त होने से स्वयं ही मार डाला' यह उसकी उक्ति उपपन्न नहीं होती । रागरहित लोचनम् गणित इति । चिरेण हि यो व्ययः सम्पद्यते न तु विद्युदिव झटिति तत्रावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारिणोऽपि तु विधेर्न विवेकलेशो- ऽप्युदभूदिति परमस्योपेक्षावत्त्वम् । अत एवाह— क्लेशो महानिति । स्वच्छन्द- स्येति । विशृङ्खलस्येत्यर्थः । एषापीति । यत्स्वयं निर्मीयते तदेव च निहन्यत इति महद्वैशसमपिशब्देन एवकारेण चोक्तम् । कोऽर्थ इति । न स्वात्मनो न जो व्यय देर तक होता रहता है, न कि बिजली की तरह झट से हो जाता है, उसमें परवाह अवश्य होती है । अनन्त काल से निर्माण करने वाले भी विधाता को विवेक का लेश भी न हुआ यह उसकी परम उपेक्षाकारिता है । इसीलिए कहते हैं—महान् क्लेश—। स्वच्छन्द—। अर्थात् शृङ्खलारहित है । इस बेचारी—। जिसे स्वयं बनाता है उसे ही मार डालता है यह बड़ी क्रूरता है यह 'भी' और 'ही' से कहा है । क्या लाभ सोच—। अर्थात् न अपना न संसार का, न निर्मित का

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तृतीय उद्योतः ५१९ ध्वन्यालोकः तस्यैवंविधविकल्पपरिहारैकव्यापारत्वात् । न चायं श्लोकः क्वचित्प्रवन्ध इति श्रूयते, येन तत्प्रकरणानुगतार्थतास्य परिकल्प्यते । पुरुष का भी (विकल्प) नहीं है, क्योंकि उसका इस प्रकार के (विकल्पों) का परिहार एकमात्र व्यापार है न कि यह श्लोक कहीं प्रबन्ध में है ऐसा सुना जाता है जिससे इसका उस प्रकरण के अनुगत अर्थ परिकल्पित होगा । इसलिए यह अप्रस्तुत- लोचनम् लोकस्य न निर्मितस्येत्यर्थः । तस्येति । रागिणो हि वराकी हतेति कृपणतालि- ङ्गितममङ्गलोपहतं चानुचितं वचनम् । तुल्यरमणाभावादिति स्वात्मन्यत्यन्त- मनुचितम् । आत्मन्यपि तद्रूपासम्भावनायां रागितायां च पशुप्रायत्वं स्यात् । ननु च रागिणोऽपि कुतश्चित्कारणात्परिगृहीतकतिपयकालव्रतस्य वा राव- णप्रायस्य वा सीतादिविषये दुष्यन्तप्रायस्य वाऽनिर्ज्ञातजातिविशेषे शकुन्तलादौ किमियं स्वसौभाग्याभिमानगर्भा तत्स्तुतिगर्भा चोक्तिर्न भवति । वीतरागस्य वा अनादिकालाभ्यस्तरागवासनावासिततया मध्यस्थत्वेनापि तां वस्तुतस्तथा पश्यतो नेयमुक्तिः न संभाव्या । न हि वीतरागा विपर्यस्तान् भावान् पश्यति । न ह्यस्य वीणाक्व णितं काकरटितकल्पं प्रतिभाति । तस्मात्प्रस्तुतानुसारेणोभय- स्यापीयमुक्तिरुपपद्यते । अप्रस्तुतप्रशंसायामपि ह्यप्रस्तुतः सम्भवन्नेवार्थो वक्तव्यः, न हि तेजसीत्थमप्रस्तुतप्रशंसा सम्भवति—अहो धिक्ते कार्ष्ण्यमिति सा परं प्रस्तुतपरतयेति नात्रासम्भव इत्याशङ्क्याह—न चेति । निस्सामान्येति उसकी—। 'बेचारी को मार डाला' यह कृपणता से आलिङ्गित और अमङ्गल से उपहत वचन रागी पुरुष के अनुचित है । अपने आप के सम्बन्ध में 'समान रमण के प्राप्त न होने से' यह वचन तो अत्यन्त अनुचित है । अपने में भी उसके समान रूप की न सम्भावना में और फिर भी रागिता में पशुप्रायता होगी । सीता आदि के विषय में रावणप्राय की अथवा अविदित जातिविशेष वाली शकुन्तला आदि के विषय में क्या यह किसी कारणवश कुछ काल के लिये व्रत धारण किए हुए रागी पुरुष की भी अपने सौभाग्य के अभिमान से युक्त और उसकी (नायिका की) स्तुति से युक्त उक्ति नहीं हो सकती है ? अथवा अनादिकाल से राग की वासना से वासित होने के कारण मध्यस्थ रूप से भी उस (नायिका) को देखते हुए वीतराग पुरुष की यह उक्ति नहीं सम्भावित है ? वीतराग पुरुष भावों को विपर्यस्तरूप से नहीं देखता, वीणा का क्वणित उसे काकरटित कल्प प्रतीत नहीं होता । इस लिए प्रस्तुत के अनुसार यह उक्ति दोनों की (रागी अथवा वीतराग की) उपपन्न होती है । अप्रस्तुतप्रशंसा में भी अप्रस्तुत अर्थ सम्भव होता हुआ ही कहा जाना चाहिए । (प्रस्तुत) तेज के विषय में अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं हो सकती । 'अहो तेरी कालिमा को धिक्कार है' इस प्रकार वह (अप्रस्तुतप्रशंसा) बल्कि प्रस्तुत में

५२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तस्मादप्रस्तुतप्रशंसैयम्। यस्मादनेन वाच्येन गुणीभूतात्मना निस्सा- मान्यगुणावलोपाध्मातस्य निजमहिमोत्कर्षजनितसमत्सरजनज्वरस्य विशेषज्ञमात्मनो न कञ्चिदेवापरं पश्यतः परिदेवितमेतदिति प्रकाश्यते। तथा चायं धर्मकीर्तेः श्लोक इति प्रसिद्धिः। सम्भाव्यते च तस्यैव। यस्मात्— प्रशंसा है। क्योंकि इस गुणीभूतरूप वाक्य से, (अपने) असाधारण गुण के दर्प से भरे, अपनी महिमा के उत्कर्ष से ईर्ष्यालु जनों को ज्वर उत्पन्न करनेवाले, तथा दूसरे किसी विशेषज्ञ को नहीं देखते हुए (किसी विद्वान् का) यह परिदेवित (क्रन्दन) है यह प्रकाशित किया जाता है। जैसा कि ऐसी प्रसिद्धि है कि यह धर्मकीर्ति का श्लोक है। और सम्भावित होता है उन्हींका। क्योंकि— लोचनम् निजमहिमेति विशेषज्ञमिति परिदेवितमित्येतैश्चतुर्भिर्वाक्यखण्डैः क्रमेण पादच- तुष्टयस्य तात्पर्यं व्याख्यातम्। नन्वत्रापि किं प्रमाणमित्याशङ्क्याह—तथा चेति। ननु किमियतेत्याशङ्क्य तदाशयेन निर्विवादतदीयश्लोकार्पितेनास्याशयं संवा- दयति—सम्भाव्यत इति। अवगाहनमध्यवसितमपि न यत्र आस्तां तस्य सम्पा- दनम्। परमं यदर्थतत्त्वं कौस्तुभादिभ्योऽप्युत्तमम्, अलब्धं प्रयत्नपरीक्षितमपि न प्राप्तं सदृशं यस्य तथाभूतं प्रतिग्राहमेकैको ग्राहो जलचरः प्राणी ऐरावतोच्चैः- श्रवोधन्वन्तरिप्रायो यत्र तदलब्धसदृशप्रतिग्राहकम्। एवंविध इति। परिदेवितविषय इत्यर्थः। इयति चार्थे अप्रस्तुतप्रशंसोपमा- लक्षणमलङ्कारद्वयम्। अनन्तरं तु स्वात्मनि विस्मयधामतयाद्भुते विश्रान्तिः। तात्पर्य रखती है इसलिए यहां असम्भव नहीं, यह आशङ्का करके कहते हैं—न कि०—। असाधारण०, अपनी महिमा०, विशेषज्ञ०, परिदेवित इन चार वाक्यखण्डों से क्रम से (श्लोक के) चारो चरणों के तात्पर्य का व्याख्यान किया। यहां भी क्या प्रमाण है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—जैसा कि—। इतने से क्या ? यह आशङ्का करके निर्विवाद उनके (धर्मकीर्ति के) श्लोक से अर्पित उनके आशय से इसके आशय का संवाद करते हैं—सम्भावित होता है—। जिसमें अवगाहन अध्यवसाय का विषय भी नहीं बना है तो उसका सम्पादन दूर रहे। परम जो अर्थतत्त्व कौस्तुभ आदि हैं उससे भी उत्तम, अलब्ध अर्थात् प्रयत्न से परीक्षा करने पर भी नहीं प्राप्त है सदृश जिसका ऐसा प्रतिग्राह अर्थात् एक-एक ग्राह जलचर प्राणी ऐरावत, उच्चैःश्रवा, धन्वन्तरि प्राय हैं जहाँ वह अलब्धसदृश प्रतिग्राहक है। इस प्रकार का०—। अर्थात् परिदेवित का विषय। इतने अर्थ में अप्रस्तुतप्रशंसा और उपमारूप से अलङ्कार हैं। अनन्त अपने आप में (धर्मकीर्ति को) विस्मय का

तृतीय उद्योतः ५२१ ध्वन्यालोकः अनध्यवसितावगाहनमनल्पधीशक्तिना- प्यदृष्टपरमार्थतत्त्वमधिकाभियोगैरपि । मतं मम जगत्यलब्धसदृशप्रतिग्राहकं प्रयास्यति पयोनिधेः पय इव स्वदेहे जराम् ॥ इत्यनेनापि श्लोकेनैवंविधोऽभिप्रायः प्रकाशित एव । अप्रस्तुत- प्रशंसायां च यद्वाच्यं तस्य कदाचिद्विवक्षितत्वं, कदाचिदविवक्षितत्वं, कदाचिद्विवक्षिताविवक्षितत्वमिति त्रयी बन्धच्छाया । तत्र विवक्षित- त्वं यथा— जिसका अवगाहन अनल्प धीशक्तिवाले द्वारा भी अध्यवसाय का विषय नहीं हुआ है, अधिक अभियोग (प्रयत्न) करनेवालों द्वारा भी जिसका परमार्थ तत्त्व देखा नहीं गया है, संसार में अपने योग्य प्रतिग्राहक (समझवाला) जिसे प्राप्त नहीं, ऐसा मेरा मत (सिद्धान्त) समुद्र के जल की भांति अपने शरीर में ही जरा को प्राप्त होगा । इस श्लोक से भी इस प्रकार का अभिप्राय प्रकाशित ही है । अप्रस्तुतप्रशंसा में जो वाच्य है वह कभी विवक्षित, कभी अविवक्षित और कभी विवक्षिताविवक्षित होता है यह तीन प्रकार की बन्धच्छाया है । उनमें से विवक्षित, जैसे— लोचनम् परस्य च श्रोतुजनस्यात्यादरास्पदतया प्रयत्नग्राह्यतया चोत्साहजननेनैवंभूतम- त्यन्तोपादेयं सत्कतिपयसमुचितजनानुग्राहकं कृतमिति स्वात्मनि कुशलकारि- तां प्रदर्श नया धर्मवीरस्पर्शनेन वीररसे विश्रान्तिरिति मन्तव्यम् । अन्यथा परि- देवितमात्रेण किं कृतं स्यात् । अपेक्षापूर्वकारित्वमात्मन्यावेदितं चेत्किं ततः स्वार्थपरार्थासम्भवादित्यलं बहुना । ननु यथास्थितस्यार्थस्यासङ्गतौ भवत्वप्रस्तुतप्रशंसा, इह तु सङ्गतिरस्त्ये- वेत्याशङ्क्य सङ्गतावपि भवत्येवैषेति दर्शयितुमुपक्रमते—अप्रस्तुतेति । धाम होने के कारण अद्भुत में विश्रान्ति है । और दूसरे श्रोता जल के अत्यादर का आस्पद होने से और प्रयत्नग्राह्य होने से उत्साह के जनन द्वारा एवंभूत अत्यन्त उपादेय होता हुआ, कतिपय समुचित जनों का अनुग्राहक किया है, इस प्रकार अपने में कुशलकारिता के प्रदर्शन से धर्मवीर के स्पर्श द्वारा वीररस में विश्रान्ति है यह मानना चाहिए । अन्यथा परिदेवितमात्र से क्या लाभ होता । यदि अपने में अपेक्षापूर्वककारित्व का आवेदन किया है तो उस स्वार्थ और परार्थ के असम्भव से क्या ! अलं बहुना ! जब कि यथास्थित अर्थ की सङ्गति न हो तो अप्रस्तुतप्रशंसा हो सकती है, यहां तो सङ्गति ही है, यह आशंका करके 'सङ्गति में भी यही होगी' यह दिखाने के लिए

५२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भृशमक्षेत्रपतितः किमित्क्षोर्दोषोऽसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥ यथा वा ममैव— अमी ये दृश्यन्ते ननु सुभगरूपाः सफलता भवत्येषां यस्य क्षणमुपगतानां विषयताम् । निरालोके लोके कथमिदमहो चक्षुरधुना समं जातं सर्वैर्न सममथवान्यैरवयवैः ॥ अनयोर्हि द्वयोः श्लोकयोरिक्षुचक्षुषी विवक्षितस्वरूपे एव न च दूसरों के लिए जो पीड़ा का अनुभव करता है, भङ्ग होने पर भी जो मधुर बना रहता है, जिसका विकार भी यहां सभी के अभिमत होता है, यदि वह इक्षु खराब क्षेत्र में गिर कर नहीं वृद्धि प्राप्त हुआ तो वह दोष क्या इक्षु का है गुणरहित मरुभूमि का नहीं ? अथवा जैसे मेरा ही— ये जो सुभग रूपोंवाले ( शरीर के अवयव ) दिखाई देते हैं इनकी जिसका क्षण भर विषय हो जाने से सफलता होती है, आश्चर्य है यह चक्षु भी अब अन्धकारमय जगत् में सभी अन्य अवयवों के समान भी नहीं रहा। इन दोनों श्लोकों में इक्षु और चक्षु विवक्षितस्वरूप ही हैं न कि प्रस्तुत हैं। लोचनम् नन्विति। यैरिदं जगद्भूषितमित्यर्थः। यस्य चक्षुषो विषयतां क्षणं गतानामेषां सफलता भवति तदिदं चक्षुरिति सम्बन्धः। आलोको विवेकोऽपि। न सममिति। हस्तो हि परस्पर्शादानादावप्युपयोगी । अवयवैरिति । अतितुच्छप्रायैरित्यर्थः अप्राप्तः पर उत्कृष्टो भागोऽर्थलाभात्मकः स्वरूपप्रथनलक्षणो वा येन तस्य। कथया- मीत्यादिप्रत्युक्तिः । अनेन पदेनेदमाह—अकथनीयमेतत् श्रूयमाणं हि निर्वेदाय उपक्रम करते हैं—अप्रस्तुतप्रशंसा—। सुभग—। अर्थात् जिन्होंने इस जगत् को भूषित कर रखा है । सम्बन्ध यह कि जिस चक्षु की विषयता क्षण भर प्राप्त हुए इनकी सफलता होती है वह यह चक्षु । आलोक विवेक भी । समान भी नहीं—। हाथ दूसरे का स्पर्श ग्रहण करने आदि में भी उपयोगी है। अवयवों—। अर्थात् अतितुच्छप्राय। जिसने पर अर्थात् उत्कृष्ट अर्थलाभरूप अथवा स्वरूपख्यातिरूप भाग प्राप्त नहीं किया है उसका । 'कहता हूँ' इत्यादि प्रत्युक्ति है । इस पद से यह कहा है—यह कहने की बात नहीं,

तृतीय उद्योतः ५२३ ध्वन्यालोकः प्रस्तुते । महागुणस्याविषयपतितत्वादप्राप्तपरभागस्य कस्यचित्स्वरूप- मुपवर्णयितुं द्वयोरपि श्लोकयोस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात् । अविवक्षित- त्वं यथा— कस्त्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि, साधु विदितं कस्मादिदं कथ्यते । वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायापि परोपकारकरिणी मार्गस्थितस्यापि मे ॥ क्योंकि महान् गुणवाला, अविषय में पड़े होने के कारण परभाग को प्राप्त न हुआ कोई (व्यक्ति) स्वरूप वर्णन करने के लिए दोनों श्लोकों में तात्पर्य के कारण प्रस्तुत है । अविवक्षित, जैसे— 'हे तुम कौन हो, कहता हूँ, 'मुझे दैव का मारा शाखोटक समझो', जैसे वैराग्य से बोल रहे हो', 'तुमने ठीक समझा', 'यह क्यों' 'यह कहता हूँ?' बाईं ओर यहां वटवृक्ष है, उसे पथिकजन सब प्रकार से सेवन करते हैं, मार्ग पर पड़े भी मेरी छाया भी परोपकार करने वाली नहीं ।' लोचनम् भवति, तथापि तु यदि निर्बन्धस्तत्कथयामि वैराग्यादिति । काक्वा दैवहतकमि- त्यादिना च सूचितं ते वैराग्यमिति यावत् । साधु विदितमित्युत्तरम् । कस्मादिति वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिर्वेदस्मरणोपक्रमं कथंकथमपि निरू- पणीयतयोत्तरम् । वामेनेति । अनुचितेन कुलादिनोपलक्षित इत्यर्थः । वट इति । च्छायामात्रकरणादेव फलदानादिशून्यादुद्धुरकन्धर इत्यर्थः । छायापीति । शाखोटको हि श्मशानाग्निज्वालालीढलतापल्लवादिश्चरुविशेषः । सुनने से निर्वेद होगा, तथापि यदि आग्रह है तो कहता हूँ । वैराग्य से— । काकु से और 'दैव का मारा' इत्यादि से तुम्हारा वैराग्य मालूम हो गया । 'तुमने ठीक समझा' यह उत्तर है । 'क्यों' यह वैराग्य के सम्बन्ध में हेतु प्रश्न है । 'यह कहता हूँ' इत्यादि निर्वेदसहित स्मरण का उपक्रम करते हुए किसी-किसी प्रकार, निरूपणीय होने के कारण उत्तर है । बाईं ओर—। अर्थात् अनुचित कुल आदि से उपलक्षित । वट वृक्ष—। अर्थात् फलदान आदि से रहित केवल छाया करने से ऊपर कंधा किए हुए । छाया भी—। श्मशान की आग की ज्वाला से झुलसे लता-पल्लवों आदि वाला कोई वृक्ष 'शाखोटक' है ।

५२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न हि वृक्षविशेषेण सहोक्तिप्रत्युक्तो सम्भवत इत्यविवक्षिताभिधे- येनैवानेन श्लोकेन समृद्धासत्पुरुषसमीपवर्तिनो निर्धनस्य कस्यचिन्म- नस्विनः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यार्थीकृतमिति प्रतीयते । विवक्षितत्वाविवक्षितत्वं यथा— उप्पहजाआएँ असोहिणीएँ फलकुसुमपत्तरहिआए वेरीएँ वइं देन्तो पामर हो ओहसिज्जिहसि ॥ अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी न चासम्भवी । तस्माद्वा- च्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्ये यत्नतो निरूपणीये । किसी वृक्ष के साथ बातचीत सम्भव नहीं, इसलिए अविवक्षित अभिधेय वाले ही इस श्लोक से समृद्ध असत्पुरुष के समीप रहनेवाले किसी निर्धन मनस्वी का निर्वेद- वचन तात्पर्य द्वारा वाक्यार्थ किया गया है, यह प्रतीत होता है । विवक्षित-अविवक्षित जैसे— 'हे पामर, कुमार्ग में पैदा हुई, अशोभन, फल और फूल और पत्तोंरहित बदरी को बोता हुआ तू उपहास का पात्र बनेगा ।' यहां वाच्य अर्थ अत्यन्त सम्भवी है और न असम्भवी है । इसलिए वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य का यत्नपूर्वक निरूपण करना चाहिए । लोचनम् अत्राविवक्षायां हेतुमाह—न हीति । समृद्धो योऽसत्पुरुषः । 'समृद्धसत्पुरुष' इति पाठे समृद्धेन ऋद्धिमात्रेण सत्पुरुषो न तु गुणादिनेति व्याख्येयम् । नात्य- न्तमिति । वाच्यभावनियमो नास्तीति न शक्यं वक्तुं, व्यङ्ग्यस्यापि भावादिति तात्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथाकुलोद्भूतायाः । अशोभनाया इति लावण्यरहितायाः । फलकुसुमपत्त्ररहिताया इत्येवम्भूतापि काचित्पुत्रिणी वा भ्रात्रादिपक्षपरिपूर्णतया सम्बन्धिवर्गपोषिता वा परिरक्ष्यते । बदर्या वृत्तिं ददत्पामर भोः, हसिष्यसे सर्वलोकैरिति भावः । एवमप्रस्तुतप्रशंसां प्रसङ्गतो यहां अविवक्षा में हेतु कहते हैं—किसी वृक्ष—। समृद्ध जो असत्पुरुष । 'समृद्ध- सत्पुरुष' इस पाठ में समृद्ध से अर्थात् ऋद्धिमात्र से सत्पुरुष, न कि गुण आदि से, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । अत्यन्त—। तात्पर्य यह कि वाच्य का सम्भव नहीं है यह नहीं कह सकते, क्योंकि व्यङ्ग्य भी सम्भव है । जैसा कि कुमार्ग में पैदा हुई अर्थात् उस प्रकार कुलीन नहीं। अशोभन अर्थात् लावण्यरहित । फल, फूल और पत्तों से रहित, इस प्रकार की भी कोई पुत्रवाली अथवा भाई आदि के भरे होने से अथवा संवन्धि-वर्ग द्वारा पोषित होकर रक्षित होती है । हे पामर, बदरी को बोता हुआ सभी लोगों द्वारा उपहास का पात्र बनेगा, यह भाव है । इस प्रकार अप्रस्तुतप्रशंसा को प्रसङ्गतः निरूपण करके

तृतीय उद्योतः ५२५ ध्वन्यालोकः प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थिते काव्ये उभे ततोऽन्यद्यत्तच्चित्रमभिधीयते ॥ ४१ ॥ चित्रं शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम् । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं वाच्यचित्रमतः परम् ॥ ४२ ॥ व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिसंज्ञितकाव्यप्रकारः गुणीभावे तु गुणीभूतव्यङ्ग्यता । ततोऽन्यद्रसभावादितात्पर्यरहितं व्यङ्ग्यार्थविशे- षप्रकाशनशक्तिशून्यं च काव्यं केवलवाच्यवाचकवैचित्र्यमात्राश्रयेणो- पनिबद्धमालेख्यप्रख्यं यदाभासते तच्चित्रम् । न तन्मुख्यं काव्यम् । काव्यानुकारो ह्यसौ । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं यथा दुष्करयमकादि । प्रधानाभाव और गुणभाव के द्वारा इस प्रकार व्यङ्ग्य के व्यवस्थित होने पर काव्य दो प्रकार के हैं, उनसे जो अन्य है वह 'चित्र' कहलाता है ॥ ४१ ॥ शब्द और अर्थ के भेद से चित्र दो प्रकार का होता है, उनमें कुछ शब्दचित्र होता है, उससे दूसरा वाच्यचित्र ॥ ४२ ॥ व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि नाम का काव्य प्रकार होता है, गुणभाव में गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है। उनसे अन्य रस, भाव आदि के तात्पर्य से रहित और व्यङ्ग्य अर्थ की प्रकाशन की शक्ति से शून्य काव्य केवल वाच्य और वाचक के वैचित्र्य- मात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर जो आलेख्य ( चित्र ) की भांति मालूम होता है वह 'चित्र' है । वह मुख्य काव्य नहीं है। वह काव्य का अनुकरण है । उनमें कुछ शब्दचित्र हैं, जैसे दुष्कर यमक आदि । उस शब्दचित्र से अन्य, व्यङ्ग्य अर्थ के संस्पर्श से लोचनम् निरूप्य प्रकृतमेव यन्निरूपणीयं तदुपसंहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसा- यामपि लावण्येत्यत्र श्लोके यस्माद्व्यामोहो लोकस्य दृष्टस्ततो हेतोरित्यर्थः ॥४०॥ एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं तत्र का वार्तेति निरूपयितु- माह—प्रधानेत्यादिना । कारिकाद्वयेन । प्रकृत ही जो निरूपणीय है उसका उपसंहार करते हैं—इस लिए—। अर्थात् अप्रस्तुत- प्रशंसा में भी 'लावण्यद्रविण०' इस श्लोक में जो लोगों का व्यामोह देखा जा चुका है उस कारण ॥ ४० ॥ इस प्रकार व्यङ्ग्य का स्वरूप-निरूपण करके जो सर्वथा उस (व्यङ्ग्य) से शून्य है उसकी बात क्या, यह निरूपण करने के लिए कहते हैं—प्रधान—। इत्यादि दो

५२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यचित्रं ततः शब्दचित्रादन्यद्व्यङ्ग्यार्थसंस्पर्शरहितं प्राधान्येन वाक्यार्थतया स्थितं रसादितात्पर्यरहितमुत्प्रेक्षादि । अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शः । प्रती- यमानो ह्यर्थस्त्रिभेदः प्राक्प्रदर्शितः । तत्र यत्र वस्त्वलङ्कारान्तरं वा व्यङ्ग्यं नास्ति स नाम चित्रस्य कल्प्यतां विषयः । यत्र तु रसादीना- मविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भवत्येव । यस्मादवस्तुसंस्पर्शिता काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वमेव जगद्गतमवश्यं कस्यचिद्र- सस्य भावस्य वाऽङ्गत्वं प्रतिपद्यते अन्ततो विभावत्वेन । चित्तवृत्तिवि- शेषा हि रसादयः, न च तदस्ति वस्तु किञ्चिद्यन्न चित्तवृत्तिविशेष- रहित, प्राधान्य अर्थात् वाक्यार्थरूप से स्थित, एवं रस आदि के तात्पर्य से रहित उत्प्रेक्षा आदि वाच्यचित्र हैं। 'यह 'चित्र' क्या है ? जहां प्रतीयमान अर्थ का संस्पर्श न हो । प्रतीयमान अर्थ तीन प्रकार का पहले प्रदर्शित हो चुका है। वहां जहां वस्तु अथवा अलङ्कारान्तर व्यङ्ग्य नहीं है वह चित्र का विषय समझ लीजिए । परन्तु जहां रसादि का विषयत्व नहीं वह काव्य का प्रकार हो सकता ही नहीं । क्योंकि काव्य में वस्तुसंस्पर्श का अभाव नहीं बन सकता और संसार की सभी वस्तुएँ अवश्य किसी रस का अथवा भाव की अङ्ग बन जाती है, अन्ततः विभावरूप से । रसादि चित्तवृत्ति विशेष हैं। वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो चित्तवृत्तिविशेष को उत्पन्न नहीं करती, यदि वह उसे लोचनम् शब्दचित्रमिति । यमकचक्रबन्धादिचित्रतया प्रसिद्धमेव तत्तुल्यमेवार्थचित्रं मन्त- व्यमिति भावः। आलेख्यप्रख्यमिति। रसादिजीवरहितं मुख्यप्रतिकृतिरूपं चेत्यर्थः। अथ किमिदमिति । आक्षेपे वक्ष्यमाण आशयः । अत्रोत्तरम्—यत्र नेति । आक्षेप्ता स्वाभिप्रायं दर्शयति—प्रतीयमान इति । अवस्तुसंस्पर्शितेति । कचटत- पादिवन्निरर्थकत्वं दशदाडिमादिवदसंबद्धार्थत्वं वेत्यर्थः । कारिकाओं से । शब्दचित्र—। भाव यह कि यमक, चित्रबन्ध आदि चित्ररूप से प्रसिद्ध ही हैं, उनके तुल्य ही अर्थचित्र को समझना चाहिए। आलेख्य की भांति—। अर्थात् रसादिरूप जीव से रहित और मुख्य अनुकरणरूप । यह चित्र—। आक्षेप में वक्ष्यमाण आशय है । यहां उत्तर है—जहां प्रतीय- मान—। आक्षेप करनेवाला अपना अभिप्राय दिखाता है—प्रतीयमान—। वस्तु संस्पर्श का अभाव—। अर्थात् क च ट त प आदि की भांति निरर्थक होगा अथवा दशदाडिम आदि की भांति असम्बद्धार्थ होगा ।

तृतीय उद्योतः ५२७ ध्वन्यालोकः मुपजनयति तदनुत्पादने वा कविविषयतैव तस्य न स्यात् कविविष- यश्च चित्रतया कश्चिन्निरूप्यते । अत्रोच्यते—सत्यं न तादृक्काव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनाम- प्रतीतिः । किं तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्यः कविः शब्दालङ्कार- मर्थालङ्कारं वोपनिबध्नाति तदा तद्विवक्षापेक्षया रसादिशून्यतार्थस्य उत्पन्न न करे तो वह कवि का विषय ही नहीं होगी और कुछ कवि का विषय चित्र- रूप से निरूपण किया जाता है । यहां कहते हैं—ठीक है, वह काव्य का कोई प्रकार नहीं है जहां रसादि की प्रतीति न हो । किन्तु जब रस, भाव आदि की विवक्षा से रहित कवि शब्दालङ्कार अथवा अर्थालङ्कार का उपनिबन्धन करता है तब उसकी विवक्षा की अपेक्षा अर्थ रसादि- लोचनम् ननु मा भूत्कविविषय इत्याशङ्क्याह—कविविषयश्चेति । काव्यरूपतया यद्यपि न निर्दिष्टस्तथापि कविगोचरीकृत एवासौ वक्तव्यः अन्यस्य वासुकि- वृत्तान्ततुल्यस्येहाभिधानायोगात् कवेश्चेद्गोचरो नूनममुना प्रीतिर्जनयितव्या सा चावश्यं विभावानुभावव्यभिचारिपर्यवसायिनीति भावः । किं त्विति । विवक्षा तत्परत्वेन नाङ्गत्वेन कथंचन । इत्यादियोऽलंकारनिवेशने समीक्षाप्रकार उक्तस्तं यदा नानुसरतीत्यर्थः । रसादिशून्येति । नैव तत्र रसप्रतीतिरस्ति यथा पाकानभिज्ञसूदविरचिते मांस- पाकविशेषे । ननु वस्तुसौन्दर्यादवश्यं भवति कदाचित्तास्वादोऽकुशलकृता- कवि का विषय मत हो (तो क्या हानि है !) यह आशंका करके कहते हैं— और कवि का विषय—। भाव यह कि काव्यरूप से यद्यपि निर्दिष्ट नहीं है तथापि उसे कवि द्वारा गोचरीकृत ही कहना चाहिए क्योंकि वासुकि के वृत्तान्त के सदृश अन्य का यहाँ अभिधान नहीं है, यदि कवि का गोचर है तो निश्चय ही इसे प्रीति उत्पन्न करनी चाहिए, और वह (प्रीति) अवश्य ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी में पर्यवसित होती है । किन्तु—। अर्थात् 'तत्पररूप से विवक्षा होनी चाहिए, अङ्गीरूप से नहीं होनी चाहिए' इत्यादि जो अलङ्कार के निवेशन में समीक्षा का प्रकार कहा है जब उसे अनुसरण नहीं करता है । रसादिशून्यता—। वहाँ रस की प्रतीति नहीं ही है, जैसे पाकक्रिया को न जानने वाले रसोइया के बनाये हुए किसी मांस के पाक में । वस्तु के सौन्दर्य से भी उस प्रकार का आस्वाद कदाचित् हो सकता है जैसे अकुशल व्यक्ति द्वारा (दही आदि को मिलाकर बनाई

५२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः परिकल्प्यते । विवक्षोपारूढ एव हि काव्ये शब्दानामर्थः । वाच्यसाम- र्ध्यवशेन च कविविवक्षाविरहेऽपि तथाविधे विषये रसादिप्रतीतिर्भवन्ती परिदुर्बला भवतीत्यनेनापि प्रकारेण नीरसत्वं परिकल्प्य चित्रविषयो व्यवस्थाप्यते । तदिदमुक्तम्— 'रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ रसादिषु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवती यदा । तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेर्यत्र न गोचरः ॥' शून्यता मानी जाती है । क्योंकि काव्य में शब्दों का अर्थ (कवि की) विवक्षा के उपारूढ ही होता है । और वाच्य की सामर्थ्य के वश कवि की विवक्षा के न होने पर भी उस प्रकार के विषय में रसादि की प्रतीति होती हुई बहुत दुर्बल होती है, इस प्रकार से भी नीरसत्व को मान कर चित्र का विषय व्यवस्थित करते हैं । इसलिए यह कहा है— 'रस, भाव आदि के विषय की विवक्षा न होने पर जो अलङ्कार का निबन्ध है वह 'चित्र' का विषय माना गया है । परन्तु जब रसादि में तात्पर्य रखनेवाली विवक्षा हो तब वह काव्य नहीं है जहाँ ध्वनि का गोचर न हो । लोचनम् यामपि शिखरिण्यामिवेत्याशङ्क्याह—वाच्येत्यादि । अनेनापीति । पूर्वं सर्वथा तच्छून्यत्वमुक्तमधुना तु दौर्बल्यमित्यपिशब्दस्यार्थः । अज्ञकृतायां च शिखरि- ण्यामहो शिखरिणीति न तज्ज्ञानाच्चमत्कारः अपि तु दधिगुडमरिचं चैतदसम- ञ्जसयोजितमिति वक्तारो भवन्ति । उक्तमिति । मयैवेत्यर्थः । अलङ्काराणां शब्दार्थगतानां निबन्ध इत्यर्थः । ननु 'तच्चित्रमभिधीयते' हुई) शिखरिणी में, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य की सामर्थ्य के वश—। इस प्रकार से भी—। पहले तो उस (रसादि) का सर्वथा शून्यत्व कहा है परन्तु अब दौर्बल्य को (कहते हैं) यह 'भी' शब्द का अर्थ है । बेवकूफ द्वारा रचित शिखरिणी में 'कमाल की शिखरिणी है' यह चमत्कार उसके ज्ञान से नहीं होता बल्कि 'यह दही, गुड़ और और मरिच को बेकायदे डालकर बनाया गया है' यह कहने वाले हो जाते हैं । कहा है—। अर्थात् मैंने ही । अर्थात् शब्दगत और अर्थगत अलङ्कारों का निबन्ध । तो उस चित्र का अभिधान

तृतीय उद्योतः ५२९ ध्वन्यालोकः एतच्च चित्रं कवीनां विश्रृङ्खलगिरां रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्य- प्रवृत्तिदर्शनादस्माभिः परिकल्पितम् । इदानीन्तनानां तु न्याय्ये काव्यनयव्यवस्थापने क्रियमाणे नास्त्येव ध्वनिव्यतिरिक्तः काव्य- प्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीनां रसादितात्पर्यविरहे व्यापार एव न शोभते । रसादितात्पर्ये च नास्त्येव तद्वस्तु यदभिमतरसाङ्गतां नीयमानं न प्रगुणीभवति । अचेतना अपि हि भावा यथायथमुचित- रसविभावतया चेतनवृत्तान्तयोजनया वा न सन्त्येव ते ये यान्ति न रसाङ्गताम् । तथा चेदमुच्यते— और निरङ्कुश वाणी वाले कवियों की रसादि के तात्पर्य की अपेक्षा न करके ही प्रवृत्ति देखी जाने से हमने इस 'चित्र' की परिकल्पना की है । परन्तु न्यायानुकूल काव्यमार्ग का व्यवस्थापन हो जाने पर अब के कवियों के लिए ध्वनि से व्यतिरिक्त काव्य का प्रकार नहीं ही है । क्योंकि परिपाक वाले कवियों का रसादि के तात्पर्य के अभाव में व्यापार ही नहीं शोभा देता । और रसादि के तात्पर्य में वह वस्तु नहीं ही है जो अभिमत रस का अंग होती हुई प्रगुण न हो जाती हो । अचेतन भी वे भाव यथानुकूल उचित रस के विभाव के रूप में अथवा चेतन वृत्तान्त की योजना से नहीं ही हैं जो रस का अङ्ग नहीं बन जाते हैं । जैसा कि यह कहते हैं— लोचनम् इति किमनेनोपदिष्टेन । अकाव्यरूपं हि तदिति कथितम् । हेयतया तदुपदि- श्यत इति चेत्—घटे कृते कविर्न भवतीत्येतदपि वक्तव्यमित्याशङ्क्य कविभिः खलु तत्कृतमतो हेयतयोपदिश्यत इत्येतन्निरूपयति—एतच्चेत्यादिना । परिपाक- वतामिति । शब्दार्थविषयो रसौचित्यलक्षणः परिपाको विद्यते येषाम् । यत्पदानि त्यजन्त्येव परिवृत्तिसहिष्णुताम् । करते हैं' इस उपदेश से क्या लाभ ? क्योंकि उसे अकाव्यरूप कह चुके हैं । यदि कहें कि 'हेय रूप होने से उसका उपदेश करते हैं तो 'घट निर्माण करने पर कवि नहीं होता है' यह भी कहना चाहिए, यह आशङ्का करके यह निरूपण करते हैं कि कवियों ने उसे किया है इसलिए हेयरूप से उसका निरूपण करते हैं—और निरङ्कुश—। परिपाक वाले—। शब्द और अर्थ का रसौचित्यरूप परिपाक है जिनका । 'जो कि पद परिवर्तन का सहन नहीं ही करते ( उसे शब्दन्यास में निष्णात लोग शब्दपाक कहते हैं )' । ३४ ध्व०

५३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥ शृङ्गारी चेत्कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् । स एव वीतरागश्चेन्नीरसं सर्वमेव तत् ॥ भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवत् । व्यवहारयति यथेष्टं सुकविः काव्ये स्वतन्त्रतया ॥ अपार काव्य-संसार में कवि एक प्रजापति है जिस प्रकार उसे विश्व लगता है उस प्रकार उसे बदल देता है । यदि कवि काव्य में शृंगारी है तो संसार रसमय हो गया और वही वीतराग है तो सभी वह नीरस हो गया । सुकवि स्वतन्त्ररूप से काव्य में अचेतन भी भावों को चेतन की भांति और चेतन को अचेतन की भांति यथेष्ट व्यवहार करता है । लोचनम् इत्यपि रसौचित्यशरणमेव वक्तव्यमन्यथा निर्हेतुकं तत् । अपार इति । अनाद्यन्त इत्यर्थः । यथारुचि परिवृत्तिमाह—शृङ्गारीति । शृङ्गारोक्तविभावानु- भावव्यभिचारिचर्वणारूपप्रतीतिमयो न तु स्त्रीव्यसनीति मन्तव्यम् । अत एव भरतमुनिः—'कवेरन्तर्गतं भावं' 'काव्यार्थान् भावयति' इत्यादिषु कविशब्दमेव मूर्धाभिषिक्ततया प्रयुङ्क्ते । निरूपितं चैतद्रसस्वरूपनिर्णयावसरे । जगदिति । तद्रसनिमज्जनादित्यर्थः । शृङ्गारपदं रसोपलक्षणम् । स एवेति । यावद्रसिको न भवति तदा परिदृश्यमानोऽप्ययं भाववर्गो यद्यपि सुखदुःखमोहमाध्यस्थ्यमात्रं लौकिकं वितरति, तथापि कविवर्णनोपारोहं विना लोकातिक्रान्तरसास्वादभुवं नाधिशेत इत्यर्थः । चारुत्वातिशयं यन्न पुष्णाति तन्नास्त्येवेति संबन्धः । यह रसौचित्य की शरण में ही कहना चाहिए, अन्यथा उसका कोई कारण न होगा । अपार—। अर्थात् आदि-अन्त रहित । रुचि के अनुसार परिवर्तन कहते हैं—शृङ्गारी—। शृङ्गार के उक्त विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी की चर्वणारूप प्रतीति रखने वाला, न कि स्त्रीव्यसनी, ऐसा समझना चाहिए । अतएव भरत मुनि 'कवि के अन्तर्गत भाव को' 'काव्य के अर्थों का भावन करता है' इत्यादि में 'कवि' शब्द को ही मूर्धाभिषिक्त रूप से प्रयोग करते हैं । रसस्वरूप के निर्णय के अवसर में इसे निरूपण कर चुके हैं । संसार—। अर्थात् उस रस में डूब जाने से (रसमय हो गया) । 'शृङ्गार' पद रस का उपलक्षण है । वही—। अर्थात् जब तक रसिक नहीं होता तब तक परिदृश्यमान भी यह भावसमूह यद्यपि लौकिक सुख, दुःख, मोह के माध्यस्थ्य (अनुभव) मात्र का वितरण करता है तथापि कवि के वर्णन के उपारोह के बिना अलौकिक रसास्वाद की भूमि को नहीं प्राप्त करता । जो अतिशय चारुत्व की पुष्टि

तृतीय उद्योतः ५३१ ध्वन्यालोकः तस्मान्नास्त्येव तद्वस्तु यत्सर्वात्मना रसतात्पर्यवतः कवेस्तदि- च्छया तदभिमतरसाङ्गतां न धत्ते । तथोपनिबध्यमानं वा न चारुत्वा- तिशयं पुष्णाति । सर्वमेतच्च महाकवीनां काव्येषु दृश्यते । अस्माभि- रपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायथं दर्शितमेव । स्थिते चैवं सर्व एव काव्यप्रकारो न ध्वनिधर्मतामतिपतति रसाद्यपेक्षायां कवेर्गुणीभूतव्य- ङ्ग्यलक्षणोऽपि प्रकारस्तदङ्गतामवलम्बत इत्युक्तं प्राक् । यदा तु चाटुषु देवतास्तुतिषु वा रसादीनामङ्गतया व्यवस्थानं हृदयवतीषु च इसलिए रस में तात्पर्य रखनेवाले कवि की कोई वह वस्तु नहीं है जो सब प्रकार से उसकी इच्छा से उसके अभिमत रस का अङ्गभाव नहीं प्राप्त करती है अथवा उस प्रकार उपनिबध्यमान होकर अतिशय चारुत्व को नहीं बढ़ाती है । और यह सब महाकवियों के काव्यों में देखा जाता है । हमने भी अपने काव्य-प्रबन्धों में यथानुसार दिखाया ही है । और इस प्रकार स्थित होने पर सभी काव्य के प्रकार ध्वनि के धर्म- भाव का अतिक्रमण नहीं करते, कवि की रसादि की अपेक्षा में गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप भी प्रकार उसका अङ्गभाव बन जाता है यह पहले कह चुके हैं । जब चाटुओं में अथवा देवता की स्तुतियों में रसादि का अंगरूप से व्यवस्थान होता है और हृदय- लोचनम् स्वेष्विति । विषमबाणलीलादिषु । हृदयवतीष्विति । 'हिअअललिआ' इति प्राकृतकविगोष्ठ्यां प्रसिद्धासु । त्रिवर्गोपायोपेयकुशलासु सप्रज्ञाकाः सहृदया उच्यन्ते । तद्यथा यथा भट्टेन्दुराजस्य— लङ्घिअगअणा फलहीलआओ होन्तुत्ति वड्ढअन्तीअ । हालिअस्स आसिसं पालिवेसवतुआ विणिठ्ठविआ ॥ अत्र लङ्घितगगना कर्पासलता भवन्त्विति हालिकस्याशिषं वर्धयन्त्या नहीं करता वह नहीं ही है यह ( वाक्य का ) सम्बन्ध है । अपने काव्य-प्रबन्धों में—। 'विषमबाणलीला' आदि में । हृदयवती—। 'हिअअललिआ' इस प्रकार से प्राकृत कवियों की गोष्ठियों में प्रसिद्ध ( गाथाओं में ) । धर्म आदि त्रिवर्ग के उपाय रूप ज्ञातव्य में कुशल ( गोष्ठियों में ) सप्रज्ञक लोग सहृदय कहे जाते हैं । वह गाथा जैसे भट्ट इन्दुराज की— 'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती हुई पड़ोस में रहने वाली स्त्री बहुत आनन्दित हुई ।' यहाँ 'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती