भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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तृतीय उद्योतः ५३१ ध्वन्यालोकः तस्मान्नास्त्येव तद्वस्तु यत्सर्वात्मना रसतात्पर्यवतः कवेस्तदि- च्छया तदभिमतरसाङ्गतां न धत्ते । तथोपनिबध्यमानं वा न चारुत्वा- तिशयं पुष्णाति । सर्वमेतच्च महाकवीनां काव्येषु दृश्यते । अस्माभि- रपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायथं दर्शितमेव । स्थिते चैवं सर्व एव काव्यप्रकारो न ध्वनिधर्मतामतिपतति रसाद्यपेक्षायां कवेर्गुणीभूतव्य- ङ्ग्यलक्षणोऽपि प्रकारस्तदङ्गतामवलम्बत इत्युक्तं प्राक् । यदा तु चाटुषु देवतास्तुतिषु वा रसादीनामङ्गतया व्यवस्थानं हृदयवतीषु च इसलिए रस में तात्पर्य रखनेवाले कवि की कोई वह वस्तु नहीं है जो सब प्रकार से उसकी इच्छा से उसके अभिमत रस का अङ्गभाव नहीं प्राप्त करती है अथवा उस प्रकार उपनिबध्यमान होकर अतिशय चारुत्व को नहीं बढ़ाती है । और यह सब महाकवियों के काव्यों में देखा जाता है । हमने भी अपने काव्य-प्रबन्धों में यथानुसार दिखाया ही है । और इस प्रकार स्थित होने पर सभी काव्य के प्रकार ध्वनि के धर्म- भाव का अतिक्रमण नहीं करते, कवि की रसादि की अपेक्षा में गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप भी प्रकार उसका अङ्गभाव बन जाता है यह पहले कह चुके हैं । जब चाटुओं में अथवा देवता की स्तुतियों में रसादि का अंगरूप से व्यवस्थान होता है और हृदय- लोचनम् स्वेष्विति । विषमबाणलीलादिषु । हृदयवतीष्विति । 'हिअअललिआ' इति प्राकृतकविगोष्ठ्यां प्रसिद्धासु । त्रिवर्गोपायोपेयकुशलासु सप्रज्ञाकाः सहृदया उच्यन्ते । तद्यथा यथा भट्टेन्दुराजस्य— लङ्घिअगअणा फलहीलआओ होन्तुत्ति वड्ढअन्तीअ । हालिअस्स आसिसं पालिवेसवतुआ विणिठ्ठविआ ॥ अत्र लङ्घितगगना कर्पासलता भवन्त्विति हालिकस्याशिषं वर्धयन्त्या नहीं करता वह नहीं ही है यह ( वाक्य का ) सम्बन्ध है । अपने काव्य-प्रबन्धों में—। 'विषमबाणलीला' आदि में । हृदयवती—। 'हिअअललिआ' इस प्रकार से प्राकृत कवियों की गोष्ठियों में प्रसिद्ध ( गाथाओं में ) । धर्म आदि त्रिवर्ग के उपाय रूप ज्ञातव्य में कुशल ( गोष्ठियों में ) सप्रज्ञक लोग सहृदय कहे जाते हैं । वह गाथा जैसे भट्ट इन्दुराज की— 'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती हुई पड़ोस में रहने वाली स्त्री बहुत आनन्दित हुई ।' यहाँ 'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती