ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सप्रज्ञकगाथासु कासुचिद्व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्ये प्राधान्यं तदपि गुणीभूत- व्यङ्ग्यस्य ध्वनिनिष्यन्दभूतत्वमेवेत्युक्तं प्राक् । तदेवमिदानींतनकवि- काव्यनयोपदेशे क्रियमाणे प्राथमिकानामभ्यासार्थिनां यदि परं चित्रेण व्यवहारः, प्राप्तपरिणतीनां तु ध्वनिरेव काव्यमिति स्थितमेतत् । तदयमत्र संग्रहः— यस्मिन् रसो वा भावो वा तात्पर्येण प्रकाशते । संवृत्त्याभिहितौ वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥ वती सप्रज्ञक जनों ( सहृदयों ) की किन्ही गाथाओं में व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य में प्राधान्य हो तब भी गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि का निष्पन्द रूप ही है यह पहले कह चुके हैं । तो इस प्रकार आधुनिक कवि के काव्य के मार्ग का उपदेश किए जाने पर प्राथमिक अभ्यासार्थी ( कवियों ) का चित्र से व्यवहार हो सकता है । परन्तु प्राप्त परिपाक वालों के लिए ध्वनि ही काव्य है यह निश्चित है । तो यह यहां सङ्ग्रह है— जिस काव्य के मार्ग में रस अथवा भाव तात्पर्यरूप से प्रकाशित हों, जहां वस्तु लोचनम् प्रातिवेश्यकवधुका निर्वृतिं प्रापिता इति चौर्यसंभोगाभिलाषिणीयमित्यनेन व्यङ्ग्येन विशिष्टं वाच्यमेव सुन्दरम् । गोला कच्छकुडङ्गे भरेण जम्बूसु पच्चमाणासु । हलिअबहुआ णिअंसइ जम्बूरसरत्तं सिअअम् ॥ अत्र गोदावरीकच्छलतागहने भरेण जम्बूफलेषु पच्यमानेषु । हालिकवधूः परिधत्ते जम्बूफलरसरक्तं निवसनमिति त्वरितचौर्यसंभोगसंभाव्यमानजम्बूफ- लरसरक्तत्वपरभागनिह्ननं गुणीभूतव्यङ्ग्यमित्यलं बहुना । ध्वनिरेव काव्यमिति । आत्मात्मिनोरभेद एव वस्तुतो व्युत्पत्तये तु विभागः कृत इत्यर्थः । वाग्रहणात्तदाभासादेः पूर्वोक्तस्य ग्रहणम् । संवृत्येति । गोप्यमान- हुई पड़ोस में रहने वाली स्त्री बहुत आनन्दित हुई' इससे 'चौर्य सुरत की अभिलाषा रखने वाली है' इस व्यङ्ग्य से विशिष्ट वाच्य ही सुन्दर है । 'गोदावरी नदी के तीर पर जामुनों के खूब पक जाने पर हालिक की पत्नी जामुन के रस में रंगा कपड़ा धारण करती है' यहां त्वरित चौर्यसम्भोग जो सम्भाव्यमान है उसके लिए जामुन के रस की लाली से परभाग ( दूसरे अंश ) का गोपन गुणीभूतव्यङ्ग्य है । अलं बहुना । ध्वनि ही काव्य है— । अर्थात् आत्मा और आत्मी ( शरीर ) का वस्तुतः अभेद ही है, किन्तु विभाग व्युत्पत्ति के लिए किया है । 'अथवा' ग्रहण से पूर्वोक्त 'तदाभास' आदि का ग्रहण है । गोपन के प्रकार से— । अर्थात् गोप्यमान रूप से प्राप्त सौन्दर्य