भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

तृतीय उद्योतः ५३३ ध्वन्यालोकः काव्याध्वनि ध्वनिर्व्यङ्ग्यप्राधान्यैकनिबन्धनः । सर्वत्र तत्र विषयी ज्ञेयः सहृदयैर्जनैः ॥ सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सह प्रभेदैः स्वैः । सङ्करसंसृष्टिभ्यां पुनरप्युद्द्योतते बहुधा ॥ ४३ ॥ तस्य च ध्वनेः स्वप्रभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येन वाच्यालङ्कारैश्च सङ्कर- संसृष्टिव्यवस्थायां क्रियमाणायां बहुप्रभेदता लक्ष्ये दृश्यते । तथाहि स्वप्रभेदसङ्कीर्णः, स्वप्रभेदसंसृष्टो गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कीर्णो गुणीभूतव्य- अथवा अलंकार ही गोपन के प्रकार से अभिहित हों, वहाँ सर्वत्र व्यङ्ग्य के प्राधान्य में एकमात्र होनेवाले ध्वनि को सहृदयजन विषयी ( विषय वाला ) समझें । ( वह ध्वनि ) गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलंकारों के साथ और अपने प्रभेदों के साथ सङ्कर और संसृष्टि द्वारा फिर और भी बहुत प्रकार से प्रकाशित होता है ॥४३॥ वह ध्वनि अपने प्रभेदों से, गुणीभूतव्यङ्ग से और वाच्य अलङ्कारों से संकर और संसृष्टि की व्यवस्था की जाने पर लक्ष्य में बहुत प्रभेदों वाला देखा जाता है । जैसा कि अपने प्रभेद से संकीर्ण, अपने प्रभेद से संसृष्ट, गुणीभूतव्यङ्ग्य से सङ्कीर्ण, गुणीभूत- लोचनम् तया लब्धसौन्दर्य इत्यर्थः । काव्याद्ध्वनीति । काव्यमार्गे । विषयीति । स त्रिवि- धस्य ध्वनेः काव्यमार्गो विषय इति यावत् ॥ ४१-४२ ॥ एवं श्लोकद्वयेन संग्रहार्थमभिधाय बहुप्रकारत्वप्रदर्शिकां पठति—सगुणीति । सहगुणीभूतव्यङ्ग्येन सहालंकारैर्यै वर्तन्ते स्वै ध्वनेः प्रभेदास्तैः संकीर्णतया संसृष्ट्या वानन्तप्रकारो ध्वनिरिति तात्पर्यम् । बहुप्रकारतां दर्शयति—तथाहीति । स्वभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येनालंकारैः प्रकाश्यत इति त्रयो भेदाः । तत्रापि प्रत्येकं संकरेण संसृष्ट्या चेति षट् । संकरस्यापि त्रयः प्रकाराः अनुग्राह्यानुग्राहकभावेन संदेहास्पदत्वेनैकपदानुप्रवेशेनेति द्वादश भेदाः । पूर्वं च ये पञ्चत्रिंशद्भेदा वाले । काव्य के मार्ग में—। विषयी—। वह काव्यमार्ग तीन प्रकार की ध्वनियों का विषय है ॥ ४१, ४२ ॥ इस प्रकार दो श्लोकों से सङ्ग्रहार्थ का अभिधान करके ( ध्वनि का ) बहुप्रकारत्व प्रदर्शन करने वाली ( कारिका को ) पढ़ते हैं—वह ध्वनि—। गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलङ्कारों के साथ जो हैं वे ध्वनि के अपने प्रभेद, उनसे संकीर्ण होने के कारण अथवा संसृष्टि के कारण ध्वनि अनन्त प्रकार की है यह तात्पर्य है । बहुप्रकारता को दर्शति हैं—जैसा कि—। अपने प्रभेदों के साथ, गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलङ्कारों के साथ प्रकाशित होता है यह तीन भेद हुए । उनमें भी प्रत्येक सङ्कर और संसृष्टि से छ हुए । संकर के भी तीन प्रकार हैं—अनुग्राह्यानुग्राहकभाव से, संदेहास्पद होने से और