ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ङ्ग्यसंसृष्टो वाच्यालङ्कारान्तरसङ्कीर्णो वाच्यालङ्कारान्तरसंसृष्टः संसृष्टा- लङ्कारसङ्कीर्णः संसृष्टालङ्कारसंसृष्टश्चेति बहुधा ध्वनिः प्रकाशते । तत्र स्वप्रभेदसङ्कीर्णत्वं कदाचिदनुग्राह्यानुग्राहकभावेन । यथा— 'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादौ । अत्र ह्यर्थशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्य- ध्वनिप्रभेदेनालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिप्रभेदोऽनुगृह्यमाणः प्रतीयते । एवं कदाचित्प्रभेदद्वयसम्पातसन्देहेन । यथा— व्यङ्ग्य से संसृष्ट, वाच्य अलङ्कारान्तर से सङ्कीर्ण, वाच्य अलङ्कारान्तर से संसृष्ट, संसृष्ट अलङ्कार से सङ्कीर्ण और संसृष्ट अलङ्कार से संसृष्ट इस प्रकार बहुत प्रकार से ध्वनि प्रकाशित होती है । उनमें, अपने प्रभेद से सङ्कीर्णत्व कभी अनुग्राह्यानुग्राहकभाव से होता है । जैसे— 'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादि में। यहां अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य (नामक) ध्वनिप्रभेद द्वारा अलक्ष्यक्रमव्यंग्य (नाम का) ध्वनिप्रभेद अनुगृह्यमाण प्रतीत होता है । इस प्रकार कभी दो प्रभेदों के सम्पात के संदेह से । जैसे— लोचनम् उक्तास्ते गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि मन्तव्याः। स्वप्रभेदास्तावन्तोऽलंकार इत्येकस- प्रतिः । तत्र संकरत्रयेण संसृष्ट्या च गुणने द्वे शते चतुरशीत्यधिके । तावता पञ्चत्रिंशतो मुख्यभेदानां गुणने सप्तसहस्राणि चत्वारि शतानि विंशत्यधिकानि भवन्ति । अलंकाराणामानन्त्यात्वसंख्यत्त्वम् । तत्र व्युत्पत्तये कतिपयभेदेषूदाहरणानि दित्सुः स्वप्रभेदानां कारिकायाम- न्यपदार्थत्वेन प्रधानतयोक्तत्वात्तदाश्रयाण्येव चत्वार्युदाहरणान्याह—तत्रेति । अनुगृह्यमाण इति । लज्जया हि प्रतीतया । अभिलाषशृङ्गारोऽत्रानुगृह्यते व्यभि- चारिभूतत्वेन । क्षण उत्सवस्तत्र निमन्त्रणेनानीता हे देवर ! एषा ते जायया एकपदानुप्रवेश से । इस प्रकार बारह भेद हुए । और पहले जो पैंतीस भेद कहे जा चुके हैं वे गुणीभूतव्यङ्ग्य के भी माने जाने चाहिएँ । उतने (पैंतीस) अपने प्रभेद अलङ्कार में भी, इस प्रकार इकहत्तर भेद हुए । वहाँ तीन संकर और संसृष्टि से गुणन करने पर २८४ भेद हुए । उनके साथ पैंतीस मुख्य भेदों का गुणन करने पर सात हजार चार सौ बीस (?) होते हैं । अलङ्कारों के आनन्त्य से (ध्वनिभेद) असंख्य हो जाता है । वहाँ व्युत्पत्ति के लिए कतिपय भेदों में उदाहरण देने के इच्छुक (वृत्तिकार) कारिका में 'अपने प्रभेदों' के (दो बहुव्रीहियों में) अन्यपदार्थ होने से प्रधान रूप से उक्त होने के कारण उनके आश्रित ही चार उदाहरणों को कहते हैं— उनमें—। अनुगृह्यमान—। प्रतीत हुई लज्जा से । व्यभिचारी रूप से अभिलाष शृङ्गार यहाँ अनुगृहीत होता है । क्षण अर्थात् उत्सव, उसमें निमन्त्रण से लाई गई, हे देवर, यह तेरी पत्नी से कुछ कही