भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

तृतीय उद्योतः ५३५ ध्वन्यालोकः खणपाहुणिआ देअर एसा जाआएँ किंपि दे अणिदा । रुअइ पडोहरवलहीघरम्मि अणुणिज्जउ वराई ॥ ( क्षणप्राघुणिका देवर एषा जायया किमपि ते भणिता । रोदिति शून्यवलभीगृहेऽनुनीयतां वराकी ॥ इति च्छाया । ) अत्र ह्यनुनीयतामित्येतत्पदमर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यत्वेन विव- क्षितान्यपरवाच्यत्वेन च सम्भाव्यते । न चान्यतरपक्षनिर्णये प्रमाण- मस्ति । एकव्यञ्जकानुप्रवेशेन तु व्यङ्ग्यत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य हे देवर, उत्सव में पाहुन बन कर आई हुई यह तेरी पत्नी कुछ कही जाने पर रो रही है । बेचारी का सूनी अटारी में मनावन करो । यहाँ 'मनावन करो' यह पद अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यरूप से और विवक्षि- तान्यपरवाच्यरूप से सम्भावित होता है । दोनों में किसी एक पक्ष के निर्णय में प्रमाण नहीं है । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का एकव्यञ्जकानुप्रवेश से व्यङ्ग्यत्व अपने अन्य लोचनम् किमपि भणिता रोदिति । पडोहरे शून्ये वलभीगृहे अनुनीयतां वराकी । सा तावद्देवरानुरक्ता तज्जायया विदितवृत्तान्तया किमप्युक्तेत्येषोक्तिस्तद्वृत्तान्तं दृष्टवत्या अन्यस्यास्तद्देवरचौरकामिन्याः । तत्र तव गृहिण्यायं वृत्तान्तो ज्ञात इत्युभयतः कलहायितुमिच्छन्त्येवमाह । तत्रार्थान्तरे संभोगेनैकान्तोचितेन परि- तोष्यतामित्येवंरूपे वाच्यस्य संक्रमणम् । यदि वा त्वं तावदेतस्यामेवानुरक्त इतीर्ष्याकोपात्तात्पर्यादनुनयनमन्यपरं विवक्षितम् । एषा तवेदानीमुचितमगहर्- णीयं प्रेमास्पदमित्यनुनयो विवक्षितः, वयं त्विदानीं गर्हणीयाः संवृत्ता इत्येतत्प- रतया उभयथापि च स्वाभिप्रायप्रकाशनादेकतरनिश्चये प्रमाणाभाव इत्युक्तम् । जाने पर रो रही है । पडोहर अर्थात् शून्य वलभी गृह (सूनी अटारी) में मनावन करो । वह देवर में अनुराग करती है, वृत्तान्त जान कर उसकी (देवर की) पत्नी ने उसे कुछ कह दिया' यह उस वृत्तान्त को देखने वाली अन्य उस देवर की चौरकामिनी की उक्ति है । वहाँ 'तुम्हारी घर वाली ने यह वृत्तान्त जान लिया है' दोनों ओर लड़ाई लगाना चाहती हुई इस प्रकार कहती है । वहां 'एकान्त में उचित सम्भोग से उसे परितुष्ट करो' इस प्रकार के अर्थान्तर में वाच्य का सङ्क्रमण है । अथवा 'तुम तो इसी में अनुरक्त हो' इस ईर्ष्याकोप के तात्पर्य से अन्य पर (ईर्ष्या कोप व्यङ्ग्य में तात्पर्य वाला) अनुनयन विवक्षित है । 'इस समय यह तुम्हारे लिये उचित अगर्हणीय प्रेमास्पद है' इस प्रकार अनुनय विवक्षित है, 'हम तो अब गर्हणीय हो गईं' इसमें तात्पर्य होने के कारण और दोनों में अपना अभिप्राय प्रकाशन करने से एकतरफे निश्चय में प्रमाण