भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 596

५३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्वप्रभेदान्तरापेक्षया बाहुल्येन सम्भवति। यथा—‘स्निग्धश्यामल’ इत्यादौ। स्वप्रभेदसंसृष्टत्वं च यथा पूर्वोदाहरण एव। अत्र ह्यर्थान्तर- संक्रमितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्य च संसर्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्य- सङ्कीर्णत्वं यथा—‘न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः’ इत्यादौ। यथा वा— प्रभेदों की अपेक्षा करने से बहुत हो सकता है। जैसे—‘स्निग्ध श्यामल’ इत्यादि में। अपने प्रभेद से संसृष्टत्व, जैसे पहले उदाहरण में ही। यहां अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य का और अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य का संसर्ग है। गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कीर्णत्व जैसे— ‘न्यक्कारो ह्ययमेव मे’ इत्यादि में। अथवा जैसे— लोचनम् विवक्षितस्य हि स्वरूपस्थस्यैवान्यपरत्वम्, संक्रान्तिस्तु तस्यैतद्रूपतापत्तिः। यदि वा देवरानुरक्ताया एव तं देवरमन्यया सहावलोकितसंभोगवृत्तान्तं प्रतीय- मुक्तिः, देवरेत्यामन्त्रणात्। पूर्वव्याख्याने तु तदपेक्षया देवरेत्यामन्त्रणं व्याख्या- तम्। बाहुल्येनेति। सर्वत्र काव्ये रसादितात्पर्यं तावदस्ति तत्र रसध्वनेर्भावध्व- नेश्चैकेन व्यञ्जकेनाभिव्यञ्जनं स्निग्धश्यामलेत्यत्र विप्रलम्भशृङ्गारस्य तद्व्यभि- चारिणश्च शोकावेगात्मनश्चर्वणीयत्वात्। एवं त्रिविधं संकरं व्याख्याय संसृष्टि- मुदाहरति—स्वप्रभेदेति। अत्र हीति। लिप्तशब्दादौ तिरस्कृतो वाच्यः, रामादौ तु संक्रान्त इत्यर्थः। एवं स्वप्रभेदं प्रति चतुर्भेदानुदाहृत्य गुणीभूतव्यङ्ग्यं प्रत्युदाहरति—गुणी- भूतेति। नहीं है यह कहा है। विवक्षित (वाच्य) का अपने रूप में स्थित अवस्था में ही अन्यपरत्व है, किन्तु संक्रान्ति उसका अन्य रूप को प्राप्त होना है। अथवा देवर में अनुरक्त ही (नायिका) की अन्य नायिका के साथ जिसका सम्भोग वृत्तान्त देख चुकी ऐसे देवर के प्रति यह उक्ति है, क्योंकि ‘देवर’ यह आमन्त्रण है। किन्तु पूर्व व्याख्यान में उसकी (जो पाहुन है) अपेक्षा से ‘देवर’ यह आमन्त्रण व्याख्यात है। बहुत—। सभी काव्य में रसादि का तात्पर्य है, वहां रसध्वनि और भावध्वनि का एक व्यञ्जक द्वारा अभिव्यञ्जन है क्योंकि ‘स्निग्धश्यामल’ यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार और शोकावेग रूप व्यभिचारी चर्वणीय हैं। इस प्रकार त्रिविध शङ्कर का व्याख्यान करके संसृष्टि का उदाहरण देते हैं—अपने प्रभेद—। यहाँ—। अर्थात् ‘लिप्त’ आदि शब्द में वाच्य तिरस्कृत है और ‘राम’ आदि में संक्रान्त है। इस प्रकार अपने प्रभेद के प्रति चार भेदों को उदाहृत करके गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रति उदाहरण देते हैं—गुणीभूत—।